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सफलता की कुंजी बेतार के तारों में | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नई चुनौतियाँ हमेशा आकर्षित करती हैं. आज से कोई 15 साल पहले जब ‘वेब’ की दुनियाँ मेरे ऊपर खुलना शुरु हुई थी तो यह अंदाज़ा न था कि इस ‘संसार’ के इतने रूप भी खुलेंगे. 'बीबीसी हिंदी डॉट कॉम' भी वेब की चुनौतियों में से एक चुनौती है. पत्रिकाओं और ख़ासतौर पर हिंदी की पत्रिकाओं की सबसे बड़ी समस्या यानी उनका पाठकों तक पहुँचना इतना सरल हो जाएगा इसकी कल्पना कर पाना कठिन था. आज संसार के किसी भी कोने में किसी भी पाठक को यह सुविधा है कि अपनी इच्छानुसार जब, जहाँ, जैसे पत्रिका पढ़ सकता है. हमारे देश के हालात दुनिया के अन्य देशों विशेष रूप से यूरोप और अमरीका से अलग हैं. भारत में ‘इंफार्मेशन टेक्नॉलॉजी’ के विस्तार में बहुत बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन फिर भी अभी करोड़ों लोगों को इससे जुड़ना है. इसमें कोई संदेह नहीं कि आज सफलता की कुंजी बेतार के तारों में छिपी है. बीबीसी हिंदी पत्रिका की यह बड़ी उपलब्धि है कि इतने कम समय में इसने संसार के हर कोने में अपने तमाम पाठक बना लिए हैं. हिंदी के लेखकों और पाठकों को पत्रिका के माध्यम से श्रेष्ठ साहित्य पढ़ने को मिल रहा है. लेकिन अभी मेरे विचार से यह बहुत अच्छी शुरुआत ही है और इतने कम में जो उपलब्धियाँ हासिल की गई है वे सराहनीय हैं. पत्रिका को अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचाना एक बड़ी ज़िम्मेदारी है. पाठकों की भागीदारी पत्रिका को जीवंत बनाती है. लेखक, पाठक और संपादक के बीच रिश्ता बनना भी बहुत ज़रूरी है. इस रिश्ते का फ़ायदा सभी को पहुँचता है. पत्रिका ऐसी कई योजनाओं पर विचार कर रही है जिससे पाठकों की भागीदारी बढ़ेगी. हिंदी साहित्य हिंदी समाज का एक महत्वपूर्ण अंश है. इस कारण पत्रिका हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी समाज पर भी विशेष ध्यान देती है. साहित्य और समाज का तालमेल पत्रिका को समग्रता प्रदान करता है. पत्रिका के संबंध में पाठकों की राय लगातार मिलती रहती है लेकिन हमें आशा है कि भविष्य में और अधिक पाठक हमें अपनी राय भेजेंगे. आप सब लोगों के सहयोग से ही पत्रिका को अच्छा से अच्छा बनाना संभव हो पाएगा. मैं 'बीबीसी हिंदी डॉट कॉम' का आभारी हूँ जिन्होंने मुझे पत्रिका का संपादन करने का मौक़ा दिया है. | इससे जुड़ी ख़बरें विजयकिशोर मानव की कविताएँ15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका मन्नो का ख़त15 दिसंबर, 2006 | पत्रिका नई पीढ़ी को सलाम08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका मातृभाषा बनाम सपनों की भाषा01 दिसंबर, 2006 | पत्रिका सफलता की कुंजी बेतार के तारों में24 नवंबर, 2006 | पत्रिका यह भी एक चुनौती है08 सितंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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