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शुक्रवार, 01 दिसंबर, 2006 को 12:50 GMT तक के समाचार
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मातृभाषा बनाम सपनों की भाषा

जब हम किसी से उसकी भाषा के बारे में पूछते हैं तो आमतौर पर यह पूछकर रह जाते हैं कि उनकी मातृभाषा क्या है.

अकबर- बीरबल की कथा की तरह हम आज भी सोचते हैं कि जो किसी की मातृभाषा होगी वह अनिवार्य रुप से उसी भाषा में सोचता और सपने देखता होगा. लेकिन अब यह अर्धसत्य है.

अर्धसत्य इसलिए क्योंकि यह बात सभी के लिए सही नहीं है. यह ठीक है कि भारत की बहुसंख्य जनता अपनी मातृभाषा में ही सोचती है लेकिन एक बड़ा समुदाय ऐसा भी तैयार हो गया है जिसके लिए मातृभाषा का विस्तार इतना बड़ा नहीं रह गया है.

इस समुदाय में वही मध्यवर्ग के लोग हैं जिसके आकार को लेकर पूरी दुनिया उत्सुक है और एक तरह से आक्रांत भी. जिस मध्यवर्ग के कारण भारत का बाज़ार आज दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक है और जिस मध्यवर्ग के कारण भारत को भविष्य की अर्थव्यवस्था के रुप में देखा जा रहा है.

इस मध्यवर्ग के लिए अब मातृभाषा एक है और उनकी शिक्षा-दीक्षा की भाषा दूसरी है. उसके लिए अपने परिजनों से संवाद की भाषा एक है लेकिन वह सोचता दूसरी भाषा में है और सपने भी शायद उसी दूसरी भाषा में देखने लगा है.

यह दूसरी भाषा वही भाषा है जो सत्ता की भाषा है और बाज़ार की भाषा है.

उत्तरी भारत के उन निवासियों के लिए जिनकी मातृभाषा हिंदी है, या हिंदी की जुड़वाँ बोलियाँ हैं, यह दूसरी भाषा अंग्रेज़ी है. वे अंग्रेज़ी बोल-लिखकर अपने आपको रोज़गार और सत्ता प्रतिष्ठान के बेहद नज़दीक पाते हैं.

लेकिन जिनकी मातृभाषा मलयालम, तमिल, तेलगु और कन्नड़ है, उनके लिए दूसरी भाषा अंग्रेज़ी के अलावा धीरे-धीरे हिंदी भी हो गई है. दक्षिण भारतीयों का बड़ा हिस्सा है जिन्हें हिंदी में सपने देखना सुखद लगता है क्योंकि वे जानते हैं कि बाज़ार की भाषा अब हिंदी भी हो गई है और उनका भविष्य इस भाषा में भी सुखद हो सकता है.

जो बच्चे कॉलसेंटरों में काम कर रहे हैं वे अगर चाहें भी तो अपनी मातृभाषा में किस तरह सोचें और किस तरह से उस भाषा में सपने देखें.

ऐसे में उन भारतीयों के बारे में क्या चर्चा करें जो रोज़गारजन्य कारणों से ही विदेशों में रह रहे हैं और उनके बच्चे मातृभाषा न सोच सकते हैं और न सोचने की कल्पना कर सकते हैं.

सुपरिचित लेखक विजय दान देथा ने एक दूसरे संदर्भ में कहा कि उन्नीसवीं सदी के आरंभ में कथित संभ्रांत लोगों की भाषा फ़्रेंच थी और रूसी भाषा में बात करना हेय सी बात मानी जाती थी लेकिन रूसी लेखकों ने अपनी लेखनी से धीरे-धीरे इस अवधारणा को बदल दिया. यह और बात है कि रूसी भाषा आज भी अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की भाषा नहीं बन पाई और न फ़्रेंच जैसा रुतबा उसे कभी मिला लेकिन रूसी भाषा पहले की तरह हेय भी नहीं रह गई.

इस तरह से देखें तो हिंदी की स्थिति भी बदल रही है. समाज के उसी मध्यम वर्ग ने जिसकी चर्चा अभी हम कर रहे थे, उसने बाज़ार को मजबूर कर दिया है कि वह सोचे भले ही अंग्रेज़ी में लेकिन बोलना उसे हिंदी में ही होगा. हिंदी के अख़बार अब कुलमिलाकर अंग्रेज़ी के अख़बारों से ज़्यादा बिकने लगे हैं, हिंदी के टेलीविज़न चैनलों को अंग्रेज़ी के चैनलों से ज़्यादा विज्ञापन मिल रहे हैं. और कोका कोला को कहना पड़ रहा है ठंडा मतलब....!

तो बजाय यह पूछने के कि आपकी मातृभाषा क्या है यह पूछने का नया रिवाज़ शुरु होना चाहिए कि आप सपने किस भाषा में देखते हैं?

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