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गुरुवार, 12 अक्तूबर, 2006 को 20:32 GMT तक के समाचार
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बड़ा आदमी आसमान से नहीं टपकता

यह सवाल अपने आपमें महत्वपूर्ण है कि क्या उम्र और अनुभव का कोई आपसी रिश्ता होता है? कुछ लोग कहते हैं कि ऐसा होता है और कुछ इससे सहमत नहीं.

अनुभव क्या होता है? आप कहेंगे कि जो आदमी करता है और सीखता है वह अनुभव होता है. यह बात सही है लेकिन इसके अलावा भी एक अनुभव-संसार होता है.

पहली स्थिति में आदमी चालीस-पचास साल तक काम करता है. किताबें पढ़ता है. और फिर एक स्थिति ऐसी आती है कि जब आदमी ख़ुद किताब बन जाता है. लोग उसे पढ़ने लगते हैं. फिर उसे किताबें पढ़ने की ज़रुरत नहीं बच जाती.

दूसरी ओर एक युवा योगी हो जाता है. दुनिया भर के लोग शाम को उसके पास चले जाते हैं और उसकी बातें सुनते हैं. लोगों को लगता है कि योगी के भीतर कुछ है जिससे उसकी बातें शांति और सुकून देती हैं. तो योगी के भीतर कहाँ से आता है यह सब? सिर्फ़ अपने जिए हुए जीवन से? यक़ीनन उसके अलावा भी कोई चीज़ होती है जो आदमी के भीतर पैदा होती है. लेकिन उस ऊँचाई तक कम ही लोग पहुँच पाते हैं.

 हर आदमी को कोशिश करनी चाहिए कि वह अमर हो जाए. ऐसा कुछ कर जाए कि वह किताबों का हिस्सा बन जाए या ख़ुद ही किताब बन जाए

स्वामी विवेकानंद की क्या उम्र थी, जब उनकी मौत हुई? वह 40 साल के भी नहीं हुए थे. उनकी बातें सुनकर लगता है कि वे हज़ारों सालों के अनुभव के साथ बोल रहे थे. वह अनुभव पढ़ने भर से नहीं आ सकता. जैसे कि महात्मा गाँधी एक दिन जोहानसबर्ग से भारत आ गए. थर्ड क्लास में घूम-घूमकर पूरे भारत की यात्रा कर ली कि मुझे अपने देश को देखना-समझना है. एक धोती पहने हुए उस दुबले से आदमी ने दुनिया भर को प्रेरित किया और आज भी करता है. वह भी किताबों से आया हुआ ज्ञान नहीं था.

ऐसे कई लोग हैं जो अपने कार्यों से अमर हो गए. किताबों का हिस्सा हो गए या ख़ुद किताब बन गए. आइंस्टाइन को ही ले लीजिए. या हिटलर को....मुझे लगता है कि हिटलर भी अमर हो गया. भले ही अपने विनाशकारी कार्यों के लिए या मानवता विरोधी कार्यों के लिए हो.

तो अमरत्व ही एक चीज़ है. हर आदमी को कोशिश करनी चाहिए कि वह अमर हो जाए. ऐसा कुछ कर जाए कि वह किताबों का हिस्सा बन जाए या ख़ुद ही किताब बन जाए.

लेकिन इसके लिए किताबी पढ़ाई अकेला रास्ता नहीं होता. कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे. लेकिन उनका एक-एक दोहा एक जीवन का अनुभव बताता है.

यह जो अनुभव है जो किताबों से नहीं आता वह एक तरह से ईश्वर प्रदत्त होता है लेकिन ऐसा नहीं है कि बड़ा आदमी आसमान से गिरता है. सब यहीं बनते हैं और अपने-आपको बनाते हैं. बस ध्येय तय करना है और ध्यान केंद्रित करके काम करते जाना है.

देवानंदचलने का नाम ज़िंदगी
अनुभव का इस्तेमाल मैं नहीं करुँगा तो कौन करेगा? ठहरा हुआ नहीं दिखना चाहता.
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