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दुनिया से आगे चलना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राज कपूर ने 'मेरा नाम जोकर' बनाई. फ़िल्म चली नहीं. राज कपूर उदास हो गए. इसी तरह गुरुदत्त ने 'कागज़ के फूल' बनाई. कोई समझ ही नहीं सका. गुरुदत्त इसके बाद कोई फ़िल्म नहीं बना सके. आज लोग 'कागज़ के फूल' देखते हैं और कहते हैं कि क्या फ़िल्म थी. अब लोग कहते हैं कि गुरुदत्त महान फ़िल्मकार था. लोग अब 'मेरा नाम जोकर' की भी तारीफ़ करते हैं. लोगों को बात बाद में समझ में आई. कई बार कोई व्यक्ति जो कर रहा होता है वह लोगों को समझ में नहीं आता. बाद में पता चलता है कि जो वह कर गुज़रा वह महान था. वे लोग दुनिया से आगे चल रहे होते हैं और दुनिया पीछे-पीछे चल रही होती है. यह सारा मामला प्रेरणा का है. हर सृजनशील व्यक्ति की प्रेरणा का एक स्रोत होता है. उसका नाम और स्वरुप चाहे जो हो मुझे लगता है कि आख़िरकार हर आदमी इस दुनिया से ही प्रेरित होता है. मैं किसी व्यक्ति या घटना के बारे में बात करना चाहता हूँ तो इसका मतलब यह है कि मैं दुनिया में ही किसी व्यक्ति या घटना से प्रेरित हुआ हूँ. लोग कैसे भी हो सकते हैं. अनपढ़ या फिर पढ़े-लिखे विद्वान, ग़रीब या मशहूर. कई बार प्रकृति प्रेरित करती है. समुद्र, बाग़, बगीचे, फूल और पत्तियाँ या फिर ख़ुशबू या ओस की एक बूँद. आदमी नहीं जानता कि कौन सी चीज़ उसे प्रेरित कर जाती है. दरअसल वह आदमी के भीतर ही होता है. तभी तो आपको कुछ सूझ नहीं रहा होता है फिर एक दिन आप आईने के सामने खड़े होते हैं और एक आइडिया आ जाता है. कोई बात शीशे की तरह आपके सामने खड़ी हो जाती है. दरअसल इंसान का दिमाग़ बहुत गहरा होता है. किसी महासागर से भी गहरा. वह सच्चाई के साथ अपनी कल्पनाएँ मिलाता है और एक असंभव सी चीज़ को संभव कर दिखाता है. इसी को आध्यात्मिकता कहते हैं और दिमाग़ का यही असर आध्यात्म कहलाता है. मुझसे अगर आप पूछें कि मैं किससे प्रेरणा लेता हूँ तो मैं कहूँगा कि मैं तो अब उम्र के उस पड़ाव में हूँ जहाँ मैं ख़ुद से ही प्रेरणा लेता हूँ. जो कुछ मैं करता हूँ उसे दुनिया से लेता हूँ, उसे आत्मसात करता हूँ फिर उसमें अपनी कल्पनाएँ डाल कर सृजन करता हूँ. उम्र और अनुभव के आपसी रिश्तों का जहाँ तक सवाल है, तो उसकी चर्चा अगली बार. |
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