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सृजनात्मकता एक तरह की बेचैनी होती है | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यथार्थ के बीच हम कल्पनाशील होकर काम करते रहते हैं. हर आदमी, चाहे वो जो भी काम कर रहा हो, कल्पनाशील होने की कोशिश में लगा रहता है. कई बार एक ही काम में पूरी कल्पना उड़ेल देनी पड़ती है और कई बार एक ही काम में कई तरह की कल्पनाएँ करनी होती हैं. मैं फ़िल्में बनाता हूँ. फ़िल्म में कविता होती है, कहानी होती है, फ़ोटोग्राफ़ी होती है, दुनिया के ट्रेंड होते हैं और जनता की सोच होती है. इन सबमें फ़िल्मकार की कल्पना काम कर रही होती है. यही कल्पना आपसे सृजन करवाती है आपको सृजनशील या रचनात्मक यानी क्रिएटिव बनाती है. हर सृजनशील व्यक्ति अच्छा काम करना चाहता है. वह एक अच्छा काम करके छोड़ जाना चाहता है. वह जानता है कि यदि औसत सा कोई काम छोड़कर जाएगा तो दुनिया उसे याद नहीं रखेगी. तो कोशिश यह होती है कि मैं ऐसा काम छोड़कर जाऊँ जो मेरे बाद ज़िंदा रहे. आदमी तो अमर नहीं होता, उसकी उम्र ढलती है और वह एक दिन दुनिया से चला जाता है. लेकिन उसका काम दुनिया में रह जाता है. इसलिए वह चाहता है कि हर काम पर उसकी छाप हो. यही सृजनात्मकता है. यही क्रिएटीविटी है. सृजनात्मकता एक तरह की बेचैनी होती है कि कुछ कर जाना है. हम अपने जीवन में कितने ही लोगों से प्रेरणा लेते हैं. कितने ही लोगों से प्रेरित होते हैं. लेकिन चुनौती यह है कि हमें भी कुछ ऐसा सामने रखना है जिससे लोग प्रेरणा ले सकें. और इसके लिए अलग होना पड़ता है. दूसरों से अलग. इस अलग होने में ख़तरा भी होता है. हो सकता है कि आपको वैसी सफलता न मिले जिसकी आप उम्मीद कर रहे हैं. हो सकता है कि आप जो कुछ कर रहे हैं वह दुनियावी पैमाने से असफल हो जाए. लेकिन इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि दुनिया का पैमाना एक औसत का पैमाना है. यदि आप दूसरों से अलग दिखना चाहते हैं तो असफलता का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए. लेकिन हर काम को इस तरह करना चाहिए कि आप अपना सर्वश्रेष्ठ करने जा रहे हैं. आपका हर काम, हर कृति मास्टरपीस की तरह होना चाहिए. ये ठीक है कि हर पीस मास्टरपीस नहीं हो सकता लेकिन एक मास्टरपीस तो होगा ही. उसके लिए कोशिशें जारी रखनी चाहिए. |
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