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मंगलवार, 09 दिसंबर, 2003 को 18:39 GMT तक के समाचार
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देवानंदः एक लंबा सफ़र
देवानंद
देवानंद का जीवन एक लंबी दास्तान रहा है

मशहूर अभिनेता देवानंद को इस वर्ष फ़िल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है.

बीबीसी हिंदी से एक बातचीत में उन्होंने कहा कि वह इस सम्मान से बहुत ख़ुश हैं लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार उनके अनगिनत दर्शकों का प्यार है.

उनका कहना था, "मेरी चुस्ती और ऊर्जा का राज़ यह है कि मैं ख़ुद को हर समय व्यस्त रखता हूँ. फ़िल्में मेरी ज़िंदगी का एक हिस्सा हैं. और आपने देखा होगा कि मेरी हर फ़िल्म में कुछ अलग हट कर होता है. मैं कभी ख़ुद को दोहराता नहीं".

देवानंद का जन्म 26 सितंबर, 1923 को गुरदासपुर में हुआ.

उन्होंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य में ग्रेजुएशन किया.

लेकिन अभिनय के शौक़ ने उन्हें बंबई पहुँचा दिया.

उनकी पहली फ़िल्म हम एक हैं 1946 में रिलीज़ हुई. लेकिन यह बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह फ़्लॉप हुई.

उसके तुरंत बाद देवानंद की मुलाक़ात गुरुदत्त से हुई और फिर उन्हें पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा.

वर्ष 1948 में रिलीज़ हुई ज़िद्दी से वह शोहरत की नई बुलंदियों पर पहुँच गए.

 मैं ख़ुद को हर समय व्यस्त रखता हूँ. फ़िल्में मेरी ज़िंदगी का एक हिस्सा हैं. और आपने देखा होगा कि मेरी हर फ़िल्म में कुछ अलग हट कर होता है. मैं कभी ख़ुद को दोहराता नहीं

देवानंद

उसके अगले साल उन्होंने अपनी प्रोडक्शन कंपनी नवकेतन की नींव डाली.

उनके निर्देशन में बनी पहली फ़िल्म प्रेम पुजारी भी कोई ख़ास सफलता हासिल नहीं कर पाई.

लेकिन हरे रामा हरे कृष्णा ने पूरी तरह देवानंद को एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया.

देवानंद की कुछ लोकप्रिय फ़िल्मों में बाज़ी, मुनीम जी, सीआईडी, पेइंग गेस्ट, गैंबलर, तेरे घर के सामने, गाइड, काला पानी, हम दोनों, जॉनी मेरा नाम और ज्वेल थीफ़ के नाम लिए जा सकते हैं.

ग्रेगरी पेक से समानता

देवानंद को कई लोग हॉलीवुड के मशहूर अभिनेत ग्रेगरी पेक से भी जोड़ कर देखते हैं.

भारतीय दर्शकों को अपने चहेते अभिनेता देवानंद में ग्रेगरी पेक की झलक नज़र आई और वे उनके दीवाने हो गए.

देवानंद के बालों का स्टाइल, चलने, बोलने का तरीक़ा सबमें ग्रेगरी पेक की झलक मिलती थी.

मुंबई फ़िल्म जगत में एक क़िस्सा मशहूर है.

अभिनेत्री सुरैया ग्रेगरी पेक की अनन्य प्रशंसक थीं. यहाँ तक कि उनका नाम देवानंद के साथ भी जुड़ने लगा था और लोग कहते थे कि इसकी वजह यही थी कि वह उनमें ग्रेगरी पेक को ढूँढती थीं.

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