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मंगलवार, 30 दिसंबर, 2003 को 02:42 GMT तक के समाचार
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देवानंद : एक सदाबहार अभिनेता

कोंकणा सेन, अजय देवगन और देवानंद
देवानंद ख़ुद को अब भी जवान मानते हैं

सदाबहार अभिनेता और हिंदी फ़िल्मों को नया अंदाज़ देने वाले देवानंद को 2003 के दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

अस्सी साल के होने के बावजूद देव आज भी ख़ुद किसी युवा से कम नहीं मानते और कहते हैं कि यह दिल की बात है.

उनका बचपन का नाम देवदत्त पिशोरीमल आनंद था और उनका जन्म पंजाब के गुरदासपुर ज़िले में सितंबर 1923 में हुआ था.

उन्होंने लाहौर के सरकारी कॉलेज से अंग्रेज़ी में डिग्री हासिल की और बंबई की फ़िल्मी दुनिया की तरफ़ रुख़ किया जहाँ उनके बड़े भाई चेतन आनंद पहले से ही सक्रिय थे.

फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बाद उनका नाम सिमटकर हो गया देवानंद और वे अभिनेता के रूप में 1946 में 'हम एक हैं' फ़िल्म में नज़र आए.

फ़िल्म कुछ ख़ास नहीं चल सकी लेकिन वहीं उनकी मुलाक़ात मशहूर नृत्य निर्देशक गुरूदत्त से हो गई.

वहाँ दोनों की दोस्ती हुई और दोनों ने वादा किया कि अगर गुरूदत्त फ़िल्म निर्देशक बनेंगे तो वे देव को अभिनेता के रूप में लेंगे और अगर देव निर्माता बनेंगे तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे.

लेकिन 1948 में बोम्बे टाकीज़ की 'ज़िद्दी' ने कामयाबी के झंडे गाड़े तो देवानंद का नाम भी चल निकला.

देवानंद
देवानंद ने हिंदी फ़िल्मों में नई शैली चलाई

बस, फिर तो एक ऐसा सफ़र शुरु हुआ जिसने हिंदी फ़िल्म इतिहास में एक नहीं कई अध्याय रच डाले.

और तभी उन्होंने एक निर्माता के रूप में भी उतरना शुरू कर दिया और अपनी निजी कंपनी बना डाली 'नेवकेतन'.

नेवकेतन बैनर की पहली फ़िल्म बनी 'अफ़सर' जिसमें ख़ुद देवानंद सुरैया के साथ नज़र आए और निर्देशन किया चेतन आनंद ने, हालाँकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई.

लेकिन देव को गुरूदत्त से किया अपना वादा याद रहा और उन्होंने गुरूदत्त को निर्देशक के रूप में फ़िल्म बनाने के लिए आमंत्रित किया और फ़िल्म सामने आई - 'बाज़ी' जिसने कामयाबी के नए रिकॉर्ड बनाए.

फ़िल्म बाज़ी की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी.

देव यहीं से दिलीप कुमार और राजकुमार की क़तार में जा खड़े हुए और इस त्रिमूर्ति ने लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मी दुनिया पर राज किया.

देवानंद की मुनीम जी, पेइंग गेस्ट, पॉकेटमार, दुश्मन, काला बाज़ार, बंबई का बाबू, काला पानी, हम दोनों, ज्वैल थीफ़ और गाइड कुछ यादगार फ़िल्मों से हैं.

गाइड के बाद उनका नाम ही पड़ गया राजू गाइड जो युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ.

जॉनी मेरा नाम, प्रेम पुजारी के बाद देव ने एक नया रास्ता दिया हिंदी फ़िल्म जगत को, अपनी फ़िल्मों 'हरे रामा हरे कृष्णा' जिसमें 'दम मारो दम' गीत ने धूम मचाई.

इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम के लिए पुकारा.

देवानंद एक समय बाद नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर हो गए.

हरे रामा हरे कृष्णा के ज़रिए उन्होंने ज़ीनत अमान की खोज की और टीना मुनीम, नताशा सिन्हा, और एकता जैसी अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देव को ही जाता है.

आज भी वह नई अभिनेत्रियों की तलाश में हैं और फ़िल्म बनाने का उनका शौक़ जारी है.

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