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'धंधे का टेम है साब, खोटी मत करो न..' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जिस समय दुनिया के अधिकांश बच्चे अपने बिस्तरों में दुबके रहते हैं, साढ़े तीन साल का छोटू उस समय मुंबई-हावड़ा रेल खंड की किसी रेलगाड़ी में कलाबाजियाँ दिखा रहा होता है. उसकी छह साल की बहन ढोलक पर थाप देते हुए, उसे लोहे के छल्ले से निकलने का इशारा करती है. इशारा पाते ही अपने चेहरे पर तरह-तरह के रंग पोत कर करतब दिखा रहा छोटू रेलगाड़ी के पूरे डब्बे में गुलाटियाँ खाने लग जाता है. इधर-उधर टकराते, चोट खाते, अपने घाव को सहलाते छोटू जब तक संभलता है, उनका बड़ा भाई नाचते-गाते हुए यात्रियों से अपना घर चलाने के लिए पैसे मांगना शुरु कर देता है. छोटू से अगर आप बात करने की कोशिश करेंगे तो वह तपाक से जवाब देता है, "धंधे का टेम है साब, खोटी मत करो न..!" कौन जाने छोटू को इस 'टेम' का मतलब भी पता है या नहीं लेकिन हर सुबह ठीक छह बजे छोटू अपने भाई-बहन के साथ घर से निकलता है और साँझ ढलने तक मुंबई-हावड़ा रेलखंड पर महाराष्ट्र के नागपुर से उड़ीसा के राउरकेला तक अलग-अलग रेलगाड़ियों में यूँ ही अपने करतब दिखाता रहता है. कमाई छत्तीसगढ़ के कई ग्रामीण इलाकों से ऐसे सैकड़ों बच्चे मुंह अंधेरे अपने परिजनों के साथ निकलते हैं और पूरे दिन अलग-अलग रेलगाड़ियों में बॉलीवुड की फ़िल्मों के ताज़ातरीन गाना गाते, तरह-तरह के करतब दिखाते शाम तक अपने घरों को लौट जाते हैं. लगभग छह साल की प्रीति बताती है कि घर लौटने के बाद हर रोज़ उन्हें टीवी देख कर नए-नए गाने सीखने पड़े हैं. ज़ाहिर है, इन बच्चों के लिए किताब, शिक्षा और स्कूल जैसे शब्दों का कोई मतलब नहीं है. जांजगीर-चांपा ज़िले की आठ साल की रजनी कहती है, "पढ़ कर क्या होगा? पैसा कमाने के लिए ही तो पढ़ते हैं. वो तो हम अभी से कमा रहे हैं." रजनी की मानें तो हरेक बच्चा एक दिन में औसतन डेढ़ से दो सौ रुपए तक कमाता है. अपने-अपने घरों के ये कमाऊ पूत अपनी कमाई का बड़ा हिस्से तो अपने मां-बाप को देते हैं, लेकिन कई बच्चे इन पैसों से नशे की तरह-तरह की आदतों का शिकार हो रहे हैं. इसके अलावा ख़तरनाक तरीके से रेलगाड़ियों में चढ़ने-उतरने के कारण भी हर वक़्त इन बच्चों की जान जोख़िम में रहती है. कभी-कभी यात्री उन्हें खराब खाद्य सामग्री दे देते हैं. इसके कारण इनमें से कई बच्चे कई-कई बार मरते-मरते बचे हैं. शादी इन में से अधिकांश बच्चों के मां-बाप कोई काम नहीं करते.
पाँच साल के सजनू और प्रीति का बड़ा भाई केसर बताता है, "घर चलाने का ज़िम्मा हम पर ही होता है. मैंने इसी तरह पैसे कमा कर अपनी और अपनी बहन की शादी की है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि हम भीख नहीं माँगते और न ही चोरी करते हैं." सुबह से शाम तक काम करते-करते कभी खेलने की इच्छा नहीं होती? इस सवाल का जवाब देते हुए पाँच साल का सजनू समझाने वाले अंदाज़ में कहता है, "हम तो खेल के लिए तरस जाते हैं लेकिन किस्मत हम से ही खेल खेलती रहती है." दक्षिण-पूर्व-मध्य रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी मानते हैं कि रेलगाड़ियों में इस तरह करतब दिखाना ग़ैरक़ानूनी है. उनका दावा है कि इस तरह करतब दिखाने और गाना गाकर पैसा मांगने वाले बच्चों के ख़िलाफ़ कई बार कार्रवाही हुई है. हालांकि मानवाधिकार और क़ानूनी मुद्दे पर सक्रिय एक संस्था की संयोजक अधिवक्ता मीना शास्त्री कहती हैं, "जिन बच्चों को हम देश का भविष्य कहते नहीं अघाते और जिन्हें स्कूल में होना चाहिए, वे रेलगाड़ियों में मारे-मार फिर रहे हैं. मेहनत मज़दूरी कर रहे हैं. यह सरासर मानवाधिकार का उल्लंघन है औऱ इसके लिए सामाजिक संगठनों को आगे आना चाहिए." मीना शास्त्री इस तरह के मामलों में सरकार को कटघरे में खड़ा करती हुई कहती हैं कि इन बच्चों के जीवन के लिए आवश्यक सुविधाएँ प्रदान करना सरकार का काम है. | इससे जुड़ी ख़बरें पढ़ाई करने का बल्ले-बल्ले आइडिया29 मार्च, 2006 | पत्रिका 'बाल फ़िल्मों के लिए अनुकूल माहौल नहीं'21 फ़रवरी, 2004 | पत्रिका रेलगाड़ियों में होंगी ट्रेन होस्टेस10 मई, 2004 | भारत और पड़ोस बहुत छोटा स्टेशन है ये21 फ़रवरी, 2003 | खेल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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