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शनिवार, 21 फ़रवरी, 2004 को 09:04 GMT तक के समाचार
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'बाल फ़िल्मों के लिए अनुकूल माहौल नहीं'

हेडा होडा फ़िल्म का दृश्य
बच्चों और जानवरों के माध्यम से बड़ों को संदेश देने का प्रयास है 'हेडा होडा'
बाल फ़िल्म 'हेडा होडा' को इस साल बर्लिन फ़िल्म समारोह में जगह मिली. वर्षों बाद किसी भारतीय बाल फ़िल्म को किसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में शामिल किया गया है.

'हेडा होडा' के निर्देशक विनोद गणात्रा ने बीबीसी हिंदी ऑनलाइन से बात की.

*'हेडा होडा' का मतलब क्या होता है?
यह कच्छी भाषा का शब्द है. जिसका मतलब है यहाँ-वहाँ या इधर-उधर. इस फ़िल्म में मैंने यह दिखाया है कि कैसे कच्छ से लगने वाली भारत-पाकिस्तान सीमा जानवरों और बच्चों के लिए बेमानी है. उनका बात से कोई मतलब नहीं होता कि वे सीमा के इस पार हैं या उस पार.

कच्छ का होने के कारण मेरी इच्छा कच्छी या फिर गुजराती में फ़िल्म बनाने की थी. लेकिन ज़्यादा दर्शकों तक पहुँचाने के लिए इसे हिंदी में बनाया गया. मैंने सोचा कम से कम फ़िल्म का नाम तो कच्छी में रखूं. अंग्रेजी में मैंने फ़िल्म का नाम 'ब्लाइंड कैमल' रखा है यानी ऐसा ऊँट जो मानवनिर्मित सीमा को देख नहीं पाता.

विनोद गणात्रा
अनेक डाक्यूमेंट्री और टीवी सीरियल बना चुके विनोद गणात्रा की पहली फ़िल्म है 'हेडा होडा'

*बर्लिन फ़िल्म समारोह में फ़िल्म को कैसा रिस्पाँस मिला?
बहुत ही अच्छा. लोगों का आठ-आठ यूरो के टिकट लेकर बच्चों के साथ फ़िल्म देखने आना सुखद अहसास दे गया. लगा कहीं तो कोई जगह है जहाँ बाल फ़िल्मों की कद्र होती है.

*भारत में बाल फ़िल्मों की क्या स्थिति है?
पूछिए मत. हर साल भारत में 800-900 फ़िल्में बनती हैं लेकिन उनमें बाल फ़िल्म चार-पाँच ही होती हैं. बाल फ़िल्मों को लेकर आम जागरूकता भी नहीं है. 'हेडा होडा' को हैदराबाद में फ़िल्म समारोह में अंतरराष्ट्रीय जूरी का विशेष पुरस्कार दिया गया, लेकिन मीडिया में कोई चर्चा तक नहीं हुई.

*बाल फ़िल्मों को बढ़ावा देने के लिए बनी सरकारी संस्था चिल्ड्रेन्स फ़िल्म सोसायटी की सक्रियता कितनी है?
मेरी फ़िल्म की निर्माता चिल्ड्रेन्स फ़िल्म सोसायटी ही है, लेकिन देश में बाल फ़िल्मों को बढ़ावा देने के लिए इसे अभी काफ़ी कुछ करना होगा. बच्चों की कोई फ़िल्म बनाने से कहीं मुश्किल काम है उसे बच्चों तक पहुँचाना. इस दिशा में मैं अपने स्तर पर काम कर रहा हूँ, लेकिन और बड़े प्रयासों की ज़रूरत है.

गौरव चावड़ा
फ़िल्म के मुख्य बाल कलाकार गौरव चावड़ा ने बर्लिन में अनेक प्रशंसक बनाए

*'हेडा होडा' आपकी पहली फ़िल्म है. कैसा अनुभव रहा इसे बनाने का?
बढ़िया अनुभव रहा. 'हेडा होडा' से जुड़े अधिकतर लोगों के लिए यह उनकी पहली फ़िल्म थी. इसलिए सब ने अतिरिक्त उत्साह से काम किया.

*बच्चों से काम कराना मुश्किल होता है या आसान?
बहुत ही आसान. इससे पहले मैंने बच्चों के लिए कई टीवी सीरियल बनाए हैं. बच्चों को जैसा बताओ वैसी एक्टिंग कर दिखाते हैं. उनमें मुंबइया फ़िल्म स्टारों के नखरे तो बिल्कुल ही नहीं होते.

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