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'माफ़िया समाज का हिस्सा बन चुका है' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विशाल भारद्वाज की फ़िल्म 'मक़बूल' को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा रहा है. बर्लिन फ़िल्म समारोह के दौरान विशाल ने इस फ़िल्म और अपनी भावी योजनाओं के बारे में बीबीसी हिंदी ऑनलाइन से बात की. *आपने कैरियर की शुरूआत संगीतकार के रूप में की है. फ़िल्म बनाने और निर्देशित करने का फ़ैसला कैसे किया? संगीत को अब भी मैं अपनी आत्मा मानता हूँ. लेकिन अपने देश में फ़िल्मी संगीत का स्वरूप ऐसा है जो कि आपको एक दायरे में बाँध देता है. इसलिए अपनी रचनात्मकता को व्यापक जगह देने के लिए मैं फ़िल्म निर्देशन की ओर मुड़ा. *'मक़बूल' को बनाने का विचार कैसे आया? यह फ़िल्म शेक्सपियर की कृति 'मैकबेथ' पर आधारित है. इसमें मानव स्वभाव, ख़ास कर अपराध और अपराधबोध की भावना का चित्रण है. हमें लगता है कि 400 साल बाद भी 'मैकबेथ' प्रासंगिक है. दरअसल इसकी 'टाइमलेस' अपील है. *'मैकबेथ' को भारतीय पृष्ठभूमि में ढालते समय आपने मुंबई के माफ़िया जगत और मुस्लिम समाज को ही क्यों चुना? भारतीय मुस्लिम संस्कृति बहुत ही विविध और आकर्षक है. मुझे शुरू से ही इसमें बहुत दिलचस्पी रही है. और 'गरम हवा' जैसी कुछ फ़िल्मों को छोड़ दें तो भारतीय फ़िल्मों में मुस्लिम समाज का बड़ा ही सतही चित्रण किया गया है. और अपराध के चित्रण के लिए मैंने मुंबई माफ़िया को चुना जो कि आज समाज का हिस्सा है.
*माफ़िया और बॉलीवुड के बीच के संबंधों के बारे में आप क्या कहेंगे? देखिए, बॉलीवुड में ग्लैमर और पैसा है. ज़ाहिर है संगठित अपराध जगत को इसमें दिलचस्पी होगी. जैसा कि मैंने कहा माफ़िया न सिर्फ़ मुंबई में है, बल्कि हर जगह है. जहाँ भी पैसा दिखेगा, माफ़िया वहाँ पहुँचेगा ही. बॉलीवुड में जब से आप्रवासी भारतीयों का पैसा आने लगा, माफ़िया की दिलचस्पी इसमें बढ़ गई, वरना फ़िल्में तो पहले भी बनती थी, ख़ूबसूरत लड़कियाँ पहले भी बॉलीवुड में काम करती थी. *'मक़बूल' की मुख्य भूमिकाओं में इरफ़ान और तब्बू को लेने का फ़ैसला आपने किस आधार पर लिया? तब्बू आज की बेहतरीन कलाकारों में से हैं. वह शबाना और स्मिता से भी आगे जाएँगी, क्योंकि अब भारतीय फ़िल्मों को कहीं ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र मिल रहा है. 'हासिल' और 'वारियर' में मैंने इरफ़ान का काम देखा था. मुझे लगा कि मेरी फ़िल्म का मैकबेथ वह बख़ूबी बन सकता है. *'मक़बूल' को कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में जगह मिली है. आप इसे आम दर्शकों की पसंद बनता देखना चाहेंगे या समीक्षकों की पसंद? 'मक़बूल' समीक्षकों के साथ-साथ आम दर्शकों को भी अपील कर रही है. मेरी फ़िल्में पूरी तरह ऑर्ट या फिर कॉमर्शियल फ़िल्म की श्रेणी में नहीं होती. मेरा इस विभाजन में विश्वास भी नहीं है. मैं तो मानता हूँ कि कोई फ़िल्म या तो मनोरंजक होती है या फिर उबाऊ.
*आप मूलत: संगीतकार रहे हैं. रिमिक्स संगीत के बारे में आपका क्या विचार है? इसे मैं संगीत का दुरुपयोग मानता हूँ. *आने वाले दिनों में आप क्या करने जा रहे हैं? मैं शेखर कपूर की एक फ़िल्म निर्देशित करने जा रहा हूँ. मैं इस साल ख़ुद की एक फ़िल्म भी बनाऊँगा. *...और संगीत के क्षेत्र में क्या कर रहे हैं? मैं वाजपेयी जी की कविताओं को संगीतबद्ध कर रहा हूँ. ख़ास कर उनकी रोमांटिक कविताओं को और उन गीतों को जो उन्होंने बच्चों के लिए लिखे हैं. कविताओं को स्वर देंगी आशा जी. |
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