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सेलफ़ोन, कंप्यूटर, वीडियो गेम, आइपॉड?...'नो सर' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के एक कस्बाई इलाके में रहने वाली ओमल गौतम से अगर आप पूछें कि आपने कभी इंटरनेट का इस्तेमाल किया है तो ओमल आहिस्ता से सर हिला कर कहती हैं, "नो सर." और कंप्यूटर? उनका जवाब फिर से वही होता है, "नो सर." सेलफ़ोन? वीडियो गेम? लैपटॉप? आइपॉड? इन तमाम सवालों पर ओमल का एक ही जवाब होता है, "नो सर." लड़कियों के एक स्कूल में 11 वीं में पढ़ने वाली ओमल की रुचि 'फ़ाइट' में है. आप उनसे अगर इस 'फ़ाइट' के बारे में बताने के लिए कहेंगे तो ओमल धीरे से कहती हैं-, "सर, मैं कराटे की खिलाड़ी हूँ." कराटे में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब तक सात स्वर्ण और तीन रजत पदक हासिल करने वाली ओमल की दुनिया घर, स्कूल और कराटे तक सीमित है. सुबह उठ कर कराटे का अभ्यास, फिर स्कूल और स्कूल से फिर सीधा घर. किसी तरह पढ़ाई पूरी हो जाए, यही ओमल की इच्छा है. ये फ़ाइट है बड़ी अपनी चार बहनों में दूसरे नंबर की ओमल का कहना है कि ज़िंदगी की 'फ़ाइट' कराटे की 'फ़ाइट' से बड़ी है. उनके पिता तेल से भरे ट्रक चलाते हैं और उन पर ही पूरे घर की ज़िम्मेवारी है. मिनटों में अच्छे-अच्छों को अपने हाथों से धूल चटाने वाली ओमल के हाथों से कराटे की कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाएँ इसलिए छूट गईं क्योंकि इन स्पर्धाओं में जाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे. सच तो यह है कि रोज़-रोज़ की ज़रुरतों के लिए भी ओमल को अपना मन मसोस कर रह जाना पड़ता है. ओमल का बस चले तो वो आकाश से तारे तोड़ कर ले आए लेकिन अभावों ने जैसे जीवन के सारे सपने ही तार-तार कर दिए हैं. ओमल कहती हैं, "पैसे होते तो मैं भी कंप्यूटर सीखती. देश-विदेश में होने वाली प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती लेकिन..." ताज़ी सब्जियाँ, सूखा जीवन ओमल की कहानी केवल उसी की कहानी नहीं है.
बिलासपुर के शनिचरी इलाके में टोकरियों में तरह-तरह की सब्जियाँ सजा कर बेचते मनोहर देवांगन को इस इलाके के लोग कराटे वाले के नाम से जानते हैं. आख़िर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस इलाके का नाम रौशन किया है. लेकिन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुल चार स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य पदक पाने वाले मनोहर के लिए रोज़ी-रोटी का व्याकरण इतना मुश्किल हो गया कि उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. चार भाई और दो बहनों वाले परिवार में संभव नहीं था कि माता-पिता की कमाई से गुज़ारा हो जाए. एक रोज़ किसी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा से लौटने के बाद मनोहर को लगा कि अब न तो ये कराटे उनके बस का है और न ही पढ़ाई. शौहरत और अख़बार के कतरन भूख मिटाने में जब विफल साबित हुए तो मनोहर ने सब्जी बेचने का काम शुरु कर दिया. मनोहर कहते हैं, "मैं भी दूसरे बच्चों की तरह आगे पढ़ना चाहता था. मुझको पढ़ने के अवसर मिलते तो मैं बहुत आगे निकल जाता. कराटे में भी मैं और मैडल लाता." पैसे होते तो... घर चलाने के दबाव के कारण उन्हें स्कूल को अलविदा कहना पड़ा. इसके बाद तो स्कूल से बाहर की दुनिया ने पढ़ाई से कोई रिश्ता बचने ही नहीं दिया. हाँ, कराटे के लिए वो अभी भी थोड़ा वक्त ज़रुर निकाल लेते हैं. सुबह आठ बजे से रात के 10 बजे तक सब्जी बेचने का काम करने वाले मनोहर कई बार दोहराने के बाद भी डिजिटल विकास के बारे में कुछ भी नहीं बता पाते. उन्हें नहीं पता कि कंप्यूटर से असल में काम क्या लिया जाता है. निनटेंडो या ब्लूटूथ के बारे में तो कोई सवाल भी पूछना व्यर्थ है. मनोहर को जब इंटरनेट के बारे में बताया गया तो उनके लिए यक़िन करना मुश्किल था कि ऐसा भी हो सकता है. लेकिन यह सब कुछ नहीं जानने का उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है. वो बड़ी बेपरवाही से कहते हैं, "पैसे होते तो हम भी यह सब सीख जाते.." | इससे जुड़ी ख़बरें हर आने वाली पीढ़ी होगी ज़्यादा स्मार्ट07 दिसंबर, 2006 | पत्रिका प्राचीन पांडुलिपि का डिजिटलीकरण17 नवंबर, 2006 | पत्रिका भारत में प्रशिक्षित युवकों की किल्लत!12 अक्तूबर, 2006 | कारोबार तकनीकी विकास के साथ बदली पत्रकारिता03 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस तकनीक के साथ बदलते पटाखे 27 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस 'तकनीक तो है लेकिन प्रयोग नहीं'09 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस तकनीकी उपकरणों की कमी: सिब्बल03 जनवरी, 2005 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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