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तकनीक के साथ बदलते पटाखे | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वक्त किसे नहीं बदल देता. फिर क्या पर्व और क्या परंपराएं. मौसम है दिवाली का और बदलते दौर में पटाखों का भी रंग-ढंग बदला है. तकनीकी विकास पटाखे के निर्माण में भी अपना असर दिखाने लगा है और नई तकनीक के साथ पटाखों की किस्म से लेकर पैकेजिंग तक बहुत कुछ बदला नज़र आ रहा है. सीटी बजाते पटाखे, आसमान को रंगीन रौशनी से भरते पटाखे या फिर एक ही डिब्बे में कई तरह की आतिशबाज़ी समेटे पटाखे कुछ वर्ष पहले तक बाज़ार में नहीं थे. पर अब बाज़ार में सबसे ज़्यादा माँग इन्ही पटाखों की है. और तो और चीन से इस बार आई पटाखों की नई किस्म भी भारतीय बाज़ारों में त्योहारों के मद्देनज़र हाथोंहाथ बिक रही है. चीनी माउज़र बच्चों में सबसे ज़्यादा माँग चीनी माउज़र पिस्तौल की है. इस पटाखे छोड़नेवाली पिस्तौल में एक बार में दस गोलियाँ भरी और दागी जा सकती हैं.
इस पिस्तौल की माँग का आलम यह है कि शुरुआत में 45-50 रूपए में मिल रही यह पिस्तौल अब 120 रूपए तक हो गई है. माना जा रहा है कि व्यापारी बढ़ी माँग को देखकर माल रोक रहे हैं और इसी वजह से इसके दामों में इज़ाफ़ा हो गया है. पर व्यापारी इन पिस्तौलों की कम आपूर्ति के लिए आयातकों को दोष देने से नहीं चूक रहे. ऐसे ही एक व्यापारी किशन कुमार बताते हैं कि सारा मुनाफ़ा तो आयातकों को हो रहा है. थोक या फुटकर विक्रेताओं को तो पूरा माल मिल ही नहीं रहा है और माँग काफ़ी ज़्यादा है. रंगीन आतिशबाज़ी पटाखों की किस्म में एक बड़ा बदलाव लोगों के बदलते मिज़ाज़ के चलते भी आया है. लोगों को अब आवाज़ करनेवाले पटाखों की जगह आसमान में ऊपर जाकर रंग बिखेरने वाले पटाखे ज़्यादा पसंद आ रहे हैं. इसे देखते हुए तमाम पटाखा निर्माता कंपनियों ने इस बात का ख़ासा ध्यान रखा है और बाज़ार ऐसे पटाखों से पटा हुआ है. सन् 1875 से इसी कारोबार में लगे विष्णु बताते हैं, "पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी फ़र्क आया है. पहले लोग चकरी और लड़ियाँ ज़्यादा पसंद करते थे पर अब ऐरियल यानी हवा में छोड़े जाने वाले पटाखों की ज़्यादा माँग है." वो बताते हैं, "तकनीकी का ज़्यादा असर बनाने पर कम पैकिंग पर ज़्यादा हुआ है. पहले पैकेज़िंग पर इतना ध्यान नहीं दिया जाता था पर अब इसपर काफ़ी ध्यान दिया जा रहा है. जो रंग भारत में उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें हम चीन और बाकी देशों में आयात करते हैं." बाज़ार में आतिशबाज़ी का सामान ख़रीदने पहुँचे संदीप चावला भी तकनीकी के बदलाव को महसूस करते हैं. संदीप बताते हैं, "पहले तो कम किस्में थीं पर अब कई तरह के पटाखे मिल रहे हैं और इनमें आसमान में ऊपर जानेवाले पटाखे ज़्यादा पसंद आते हैं. फिर विदेशों में जिन पटाखों का मज़ा लोग लेते थे, अब उन्हें भी हम यहाँ खरीद सकते हैं." फीकी होती रौनक पर पटाखे का छोटा-बड़ा, हर व्यापारी इस बार बाज़ार की मंदी का रोना रो रहा है. भले ही चीनी पटाखों की काफ़ी माँग देखने को मिले पर लोग पटाखे कम ही ख़रीद रहे हैं. इसकी वजह कई हैं. मसलन, पटाखों के बढ़ते दाम, प्रदूषण के ख़िलाफ़ लोगों में बढ़ती जागरूकता और पटाखों की निर्माण से लेकर बिक्री तक चुस्त होते नियम व कानून. दिल्ली के सदर बाज़ार में पटाखे ख़रीद रहे विमल कुमार बताते हैं,"पटाखों के दाम काफ़ी बढ़ गए हैं. कई तरह के पटाखे तो इतने महंगे हैं कि ख़रीदना मुश्किल है पर बच्चों की माँग के आगे झुकना ही पड़ता है." सो बाज़ार कुछ रंगीन है तो कुछ फीका और इन तमाम चीज़ों के बीच खरीददारी चल रही है. | इससे जुड़ी ख़बरें दीवाली, दीया और एक कुम्हार की पीड़ा...24 अक्तूबर, 2005 | भारत और पड़ोस भारतीय कलाइयों पर चीनी राखियाँ30 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस भारत के खेतों में चीनी उपकरण24 नवंबर, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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