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दीवाली, दीया और एक कुम्हार की पीड़ा... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्या आप दीवाली पर दीए ख़रीदते हैं? शायद नहीं और अगर ख़रीदते भी हैं तो शगुन के लिए पाँच या दस. जगमग बिजली की रोशनी में दीयों की टिमटिमाहट के लिए अब जगह कहाँ है. लेकिन इसी कारण दीपावली शब्द ही जिस दीप से बना है, उसका अस्तित्व आज ख़तरे में है. जैसे-जैसे ज़माने का चलन बदल रहा है मिट्टी के दीए की कहानी ख़त्म होती जा रही है. पुश्तों से यही काम करने वाले कुम्हार आज दीवाली के पहले उदास और मायूस हैं. लखनऊ के क़रीब के गाँव तेलीबाग़ के सत्तूराम उन्हीं कुम्हारों में से एक हैं. मिलिए सत्तूराम से "मैं सत्तूराम, पिछले पचास साल से दीए बना रहा हूँ. साथ-साथ कुल्हड़, प्याला, हड़िया... जो बिक जाए, वो बनाता हूँ. नहीं बिकता तो ढेर लगा रहता है. और ऐसा अक्सर होता है. मिट्टी का माल अब बिकता कहाँ है. पहले ज़माने में यह समय हमारे लिए बड़ा व्यस्त समय होता था. लोग घरों में घी-तेल के दीए जलाते थे और सौ, दो सौ, हज़ार दीए तक घरों के लिए ख़रीदे जाते थे. लेकिन आजकल 10-20 से ही काम चला लेते हैं. और कई घरों में तो वो भी नहीं. मोमबत्ती और बिजली की झालर है तो दीए को कौन पूछता है. रही सही कसर मशीनों ने निकाल दी है. कुम्हार की चाक उनका मुकाबला नहीं कर सकती. इसलिए मेरे जैसे छोटे आदमी का कारोबार तो ठप्प ही हो रहा है. दीवाली के समय अगर काम थोड़ा ज़्यादा हुआ भी तो ईंधन, कंडा और भूसी वगैरह में चला भी जाता है. बाक़ी साल तो कोई काम ही नहीं होता, केवल कुल्हड़ बनते हैं. आमदनी मेरे घर से व्यापारी 10 रूपए में सौ दीए ख़रीद कर ले जाता है जो वो 20-25 रूपए में बाज़ार में बेच लेता है.
यानी सौ दिए बिके तो आमदनी हुई दस रूपए. पाँच लग जाते हैं ईंधन और मिट्टी के, पाँच हमारी मज़दूरी. इसी में बच्चों को पालना, घर चलाना और उनका शादी ब्याह करना. उस पर तुर्रा यह कि मिट्टी मिलती नहीं, बाहर से आती है, मोल ख़रीदनी पड़ती है. फिर भी, इस काम में मेरा पूरा परिवार लगा है. क्योंकि कोई और काम है ही नहीं, सरकार की तरफ़ से कोई मदद नहीं. कोई और रोज़गार मिल नहीं रहा. कुम्हार का काम हम छोड़ भी नहीं सकते, यह हमारा धंधा है. इसे छोड़ कर कहीं मज़दूरी या चौका बर्तन करना हमारे बस का नहीं. शायद यही हमारी कमज़ोरी है. और एक दीवाली ही है जब हम कोई आमदनी कर सकते थे लेकिन जिस तरह बाक़ी महँगाई बढ़ी है, दीयों के दाम नहीं बढ़े. मिट्टी के गणेश-लक्ष्मी मँहगे कैसे हों जब उनकी जगह लोगों ने प्लास्टिक और फ़ाइबर की मूर्तियाँ खरीदाना शुरू कर दिया है. मिट्टी की और हमारे श्रम की क़ीमत कहाँ है. हालत यह है कि माल ख़रीदने आज व्यापारी भी नहीं आ रहे. सच कहूँ, दीया जलना इतना कम हो गया है कि लगता है कि एक दिन शायद लोग दीए को भूल ही जाएं. और कहीं मेरे साथ ही दीए की कहानी भी ख़त्म न हो जाए." | इससे जुड़ी ख़बरें 125 साल के सफ़र के बाद भारतीय सर्कस07 दिसंबर, 2004 | मनोरंजन भारतीय कलाइयों पर चीनी राखियाँ30 अगस्त, 2004 | भारत और पड़ोस संगीत दंगल में राजनीति की बखिया उधड़ी26 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस अब कलाकारों की कमी से जूझते सर्कस20 अक्तूबर, 2003 | मनोरंजन तकनीक से जूझते पोस्टर | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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