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गुरुवार, 12 अक्तूबर, 2006 को 12:08 GMT तक के समाचार
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भारत में प्रशिक्षित युवकों की किल्लत!

आईआईटी-मुंबई का एक छात्र अंकित जैन
भारत की होनहार प्रतिभाओं की दुनिया भर में माँग है
अंकित जैन भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान-आईआईटी मुंबई में अंतिम वर्ष के छात्र हैं और शुक्रवार दोपहर बाद वह अपना समय खेलकूद और मनोरंजक गतिविधियों में बिताते हैं.

परीक्षा की कठिन प्रक्रिया के बीच से अंकित कुछ समय निकालते हैं और वहाँ उनकी प्रतिस्पर्धा क्लासरूम के बजाय खेल के मैदान में होती है. वह अक्सर बॉस्केटबॉल खेलते हैं.

आईआईटी भारत में एक ऐसा संस्थान है जिसमें प्रवेश के लिए बहुत मुश्किल चयन प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है.

हर साल लगभग दो लाख युवक-युवतियाँ आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं लेकिन उनमें से सिर्फ़ दो प्रतिशत ही दाख़िला पाते हैं.

अंकित और उसके कुछ दोस्तों को मुंबई के आईआईटी संस्थान में बहुत बुद्धिमान, होनहार और प्रतिभाशाली छात्र माना जाता है और उन्होंने पता लगा लिया है कि भारतीय और विदेशी कंपनियों में उन जैसे युवकों की भारी माँग है.

अंकित बॉस्केटबॉल खेलते हुए कुछ मिनट की फुर्सत निकालकर हमसे बात करते हैं और कहते हैं, "संस्थान परिसर में अक्सर भर्ती के मेले लगते रहते हैं. आईबीएम, एक्सेंटर, गूगल, यूबीएस, इन्फ़ोसिस, टीसीएस... सभी बड़े नामों वाली भारतीय और विदेशी कंपनियाँ यहाँ भर्ती के लिए आती हैं."

अंकित बताते हैं, "ये कंपनियाँ जो वेतन आदि के पैकेज पेश करती हैं वे सचमुच अदभुत होते हैं. अमरीकी कंपनिया तो एक लाख डॉलर यानी 53 हज़ार पाउंड स्टर्लिंग प्रतिवर्ष तक का वेतन देने की पेशकश करती हैं, इतना ही नहीं भारतीय कंपनियाँ भी हममें भर्ती करने के लिए इनसे ज़्यादा वेतन देने की पेशकश करने में नहीं हिचक रही हैं जिनमें आकर्षक आवास सुविधा, कार क़र्ज़ और कामकाज के बेहतर हालात की सुविधा भी होती है."

प्रतिभा की माँग

अंकित जैन भारत के उन तीस लाख छात्रों में से एक हैं जो हर साल विभिन्न विश्वविद्यालयों से स्नातक की परीक्षा पास करके निकलते हैं और अगर शहरों की बात करें तो वहाँ से निकलने वाले ग्रेजुएट युवकों को अब नौकरी मिलने में आसानी हो रही है और कुछ जानकारों का तो ये भी कहना है कि प्रतिभाशाली और सुशिक्षित युवकों की कमी होती जा रही है.

भारत में विदेशी युवक
विदेशी युवक भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं

भारत की अर्थव्यवस्था में तेज़ी आने से व्यावसायिक क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर तेज़ी से बढ़े हैं. साल 2006 की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था में आठ प्रतिशत की वृद्धि बताई गई है जो उम्मीद से भी ज़्यादा है.

इस आर्थिक वृद्धि की वजह से प्रतिभाशाली युवकों की तलाश भी तेज़ हो गई है. देश के निजी क्षेत्र के एक बड़े बैंक आईसीआईसीआई ने अगले पाँच साल में क़रीब चालीस हज़ार युवकों को भर्ती करने की योजना बनाई है.

भारत के एक बड़े औद्योगिक घराने रिलायंस ने सुपरमार्केट की एक चेन यानी श्रंखला शुरू करने की घोषणा की है जो यूरोप और अमरीका में टेस्को, वॉलमार्ट या एस्डा की तर्ज़ पर होंगे. इनके लिए रिलायंस अन्य कंपनियों से होनहार और प्रतिभाशाली युवकों को भर्ती करने की कोशिश कर रहा है.

लेकिन इसके साथ एक समस्या भी सामने आ रही है कि हर साल स्नातक की डिग्री हासिल करने वाले प्रतिभाशाली और होनहार युवकों की संख्या इतनी नहीं है जो कंपनियों की ज़रूरत पूरी कर सके क्योंकि छोटे क़स्बों के कॉलेजों में पढ़ने वाले युवक-युवतियाँ शायद उनकी ज़रूरतें नहीं पूरी कर सकते.

स्नातकों की कमी

मानव संसाधन के क्षेत्र में काम करने वाली एक सलाहकार कंपनी मर्सर ह्यूमन रिसोर्स कंसल्टिंग के भारत अध्यक्ष आर शंकर का कहना है कि देश में प्रतिभाशाली युवकों की भारी कमी है.

आर शंकर कहते हैं, "तकनीकी क्षेत्र में ही देखिए. देखिए कि कंपनियाँ कितनी बड़ी संख्या में लोगों की भर्ती करना चाहती हैं. टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ में ही सत्तर हज़ार से ज़्यादा लोग काम करते हैं, और कंपनियाँ बहुत थोड़े से समय में प्रतिभाशाली युवकों को भारी संख्या में भर्ती करने की होड़ में लगी हैं."

आर शंकर कहते हैं कि विभिन्न कंपनियों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित और प्रतिभाशाली युवक हैं ही नहीं.

भारत में कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर व्यापार की देखभाल करने वाली संस्था नैसकॉम का कहना है कि वर्ष 2010 तक देश में लगभग पाँच लाख तकनीकी प्रशिक्षित युवकों की कमी हो सकती है.

और ऐसा नहीं है कि यह किल्लत सिर्फ़ तकनीकी क्षेत्र में ही हो. अन्य क्षेत्रों में सक्रिय भारतीय कंपनियों के लिए में भी अच्छा स्टाफ़ रखने के लिए प्रतिभाशाली और होनहार युवकों को भर्ती करना एक समस्या बनती जा रही है.

भारत में निर्माण और इंजीनियरिंग क्षेत्र की एक बड़ी कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) के कर्मचारियों की संख्या में 10 प्रतिशत की कमी आई है क्योंकि उसके बहुत से कर्मचारी तेज़ी से बढ़ते तकनीकी और खुदरा बाज़ार में उतने वाली कंपनियों की तरफ़ भाग रहे हैं.

एक समाधान है...
 हम अपने कर्मचारियों को ऐसा काम देते हैं जो उनके लिए चुनौती वाला होता है और जिसे करने में वह आनंद लेते हैं. मतलब ये कि वो जो कुछ भी करें, उसे करने में उन्हें मज़ा आए. यह एक तरीका है कि हम अपने प्रतिभाशाली और होनहार कर्मचारियों को अपने साथ ही बनाए रख सकते हैं.
देवस्थली

तकनीकी और खुदरा क्षेत्रों की कंपनिया कर्मचारियों को जो वेतन और अन्य सुविधाएँ देने की पेश कर रही हैं वह उनके मौजूदा वेतन से तीन गुना तक ज़्यादा होता है.

लार्सन एंड टुब्रो के मुख्य वित्तीय अधिकारी वाईएम देवस्थली कहते हैं कि उनकी कंपनी ने इस चुनौती का सामना करने के लिए एक तरीका निकाला है.

देवस्थली बताते हैं, "हम अपने कर्मचारियों को ऐसा काम देते हैं जो उनके लिए चुनौती वाला होता है और जिसे करने में वह आनंद लेते हैं. मतलब ये कि वो जो कुछ भी करें, उसे करने में उन्हें मज़ा आए. यह एक तरीका है कि हम अपने प्रतिभाशाली और होनहार कर्मचारियों को अपने साथ ही बनाए रख सकते हैं."

देवस्थली यह भी कहते हैं कि यह हालाँकि बहुत चुनौतीपूर्ण भी है. हम इस समाधान के तहत अपने कर्मचारियों को वित्तीय सुविधाओं के अलावा, प्रशिक्षण और यात्राएँ करने की सुविधाएँ और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं पर काम करने का मौक़ा भी देते हैं.

उत्सुकता

इसी किल्लत को पूरा करने के लिए कुछ कंपनियाँ विदेशों से भी भर्तियाँ कर रही हैं और भारत में आर्थिक वृद्धि के माहौल को देखते हुए विदेशी युवक भी आकर्षित हो रहे हैं.

मैं ख़ुद देखना चाहता था और अब अपने करियर अनुभव में भारत का नाम भी शामिल करना एक ख़ासियत हो सकती है
फ्रांस से भारत आया एक नौजवान

डेनिस मर्सीयर एक साल पहले फ्रांस से मुंबई में टाटा कंसल्टेंसी सर्वेसिज़ में काम करने के लिए आए थे. उनकी तरह पूर्वी यूरोपीय देशों के अलावा ब्राज़ील, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों से भी प्रोद्योगिकी प्रशिक्षित युवक भारत का रुख़ कर रहे हैं.

24 वर्षीय डेनिस मर्सीयर कहते हैं, "मैं फ्रांस में अख़बार के पहले पन्ने पर हर रोज़ भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में ख़बरें पढ़ता था. मैं यह जानने के लिए उत्सुक था कि सांस्कृतिक रूप से चलायमान और आर्थिक तेज़ी कर रहे भारत में आख़िर हो क्या रहा है. मैं ख़ुद देखना चाहता था और अब अपने करियर अनुभव में भारत का नाम भी शामिल करना एक ख़ासियत हो सकती है."

भारतीय कंपनियाँ फिलहाल विदेशों से प्रशिक्षित युवकों को बुलाकर इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर सकती हैं लेकिन दरअसल यह कोई दीर्घकालिक और टिकाऊ हल नहीं नज़र आता है.

विडंबना ये भी है कि भारत में लाखों युवक ऐसे भी हैं जो शिक्षित हैं लेकिन उन्हें ढंग का रोज़गार नहीं मिल पाता है और वे ऐसे क्षेत्रों में काम करने के लिए मजबूर होते हैं जहाँ उन्हें मनपसंद काम और वेतन नहीं मिल पाता और अनेक मामलों में उनकी प्रतिभा का सही इस्तेमाल नहीं हो पाता.

एक बड़ा सवाल ये है कि क्या भारत अपने यहाँ प्रशिक्षित युवकों की कमी की समस्या का कोई समाधान निकाल पाएगा? अगर हाँ तो कैसे? साधारण स्नातक युवकों को तकनीकी और व्यासायिक तौर पर प्रशिक्षित करके इस कमी को पूरा करने की कोशिश की जाए तो दोहरा फायदा हो सकता है.

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