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'तकनीक तो है लेकिन प्रयोग नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भूकंप विज्ञानी डीके पॉल का कहना है कि भारत में भूकंपरोधी भवन निर्माण की तकनीक तो उपलब्ध है लेकिन उसका प्रयोग नहीं हो पा रहा है. उनका कहना है कि वैसे तो यह तकनीक भी है कि भूकंप आने से पहले उसके संकेत मिल जाएँ और इसके लिए बड़े उपकरण लगाने पड़ेंगे और यह बेहद खर्चीला काम है. आईआईटी, रुढ़की में भूकंप इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष डीके पॉल मानते हैं कि भूकंप की संभावना वाले इलाक़ों में मकान बनाने की तकनीक बदलनी होगी. उल्लेखनीय है कि भूकंप इंजीनियरिंग पर काम करने वाला आईआईटी रुढ़की देश का एकमात्र संस्थान है. बीबीसी संवाददाता नगेन्दर शर्मा से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि भूकंप की अग्रिम सूचना मिल तो सकती है लेकिन इसके लिए पूरे देश में इसके उपकरण लगाने होंगे. उन्होंने स्वीकार किया कि भारतीय वैज्ञानिकों ने तकनीक तो ढूँढ़ ली है लेकिन उसका उपयोग नहीं हो पा रहा है. उनका कहना था कि ये कहना भी ठीक नहीं कि सरकार कुछ नहीं कर रही है और हाल ही में कुछ अच्छे क़दम उठाए गए हैं. डॉ पॉल का कहना था कि जापान जैसे देश को भी भूकंप रोधी मकान खड़ा करने के लिए पचास साल का समय लगा इसलिए भारत को भी समय देना चाहिए और आने वाले समय में भारत भी ऐसा हो जाएगा. उनका कहना है कि सबसे बड़ी समस्या पत्थरों वाले मकानों की है क्योंकि भूकंप में सबसे ज़्यादा नुक़सान इसी से होता है. भूकंप इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ का कहना था कि चूंकि पत्थरों वाले मकान सबसे सस्ते होते हैं इसलिए ग़रीब इसी तकनीक को अपनाते हैं. |
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