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शुक्रवार, 17 नवंबर, 2006 को 15:48 GMT तक के समाचार
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प्राचीन पांडुलिपि का डिजिटलीकरण

पांडुलिपि का डिजिटल रूप तैयार करने की योजना
पांडुलिपि का डिजिटल रूप तैयार करने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है
अमरीका के कुछ वैज्ञानिक भारत की एक 700 साल पुरानी धार्मिक पांडुलिपि का आधुनिक डिजिटल रूप तैयार करने में जुटे हुए हैं. हिंदू धर्म की यह पांडुलिपि सर्वमूल ग्रंथ ताड़ पत्र पर लिखी हुआ है.

न्यूयॉर्क के रोसेस्टर प्रोद्योगिकी संस्थान (आरआईटी) इस पांडुलिपि को बचाने के लिए आधुनिक फ़ोटो तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. इस पांडुलिपि में हिंदू दर्शन का कुछ मुख्य सिद्धांतों का विवरण है जिनमें जीवन का अर्थ और ईश्वर की भूमिका को समझाया गया है.

36 अध्यायों वाले इस बेशक़ीमती ग्रंथ को संस्कृत में श्री माधवाचार्य (1238 - 1317 ईस्वी) ने लिखा था. श्री माधवाचार्य को भारत के महान धार्मिक चिंतकों में गिना जाता है.

इस ग्रंथ में हिंदू धर्म की पवित्र पुस्तकों - वेद, उपनीषद, गीता, पुराण, ब्रह्मा-सूत्र, महाभारत आदि पर अध्याय लिखे गए हैं. इसके अलावा इस ग्रंथ में स्वतंत्र दार्शनिक विषयों पर भी लिखा गया है जिनमें दैनिक जीवनचर्या और ईश्वर की स्तुति में अनेक कविताएँ भी हैं.

आरआईटी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के प्रोफ़ेसर डॉक्टर पीआर मुकुंद इस ग्रंथ का डिजिटल रूप तैयार करने की इस परियोजना की अगुवाई कर रहे हैं और उनके सहयोगी रोजर ईस्टन इस काम में मदद कर रहे हैं.

डॉक्टर मुकुंद का कहना था, "श्री माधवाचार्य का पिछली सहस्राब्दि में भारत के आध्यात्मिक नेताओं में महत्वपूर्ण स्थान था और समाज पर उनके दार्शनिक विचारों को गहरा प्रभाव पड़ा."

"उन्होंने हिंदू दर्शन की पवित्र पुस्तकों के तमाम पहलुओं पर टिप्पणी लिखीं और आध्यात्मिक विश्व का ढाँचा पेश किया... इसलिए इस बेशक़ीमती ग्रंथ को आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेजकर रखना बहुत बड़ा काम होगा."

पांडुलिपि का ताम्र पत्र काफ़ी ख़राब हो गए हैं
पांडुलिपि का ताम्र पत्र काफ़ी ख़राब हो गए हैं

यह पांडुलिपि कर्नाटक के उडुपि शहर में एक मठ में रखी हुई थी. डॉक्टर मुकुंद कुछ मठों के साथ लंबे समय से संबंद्ध रहे हैं और दर्शन पर प्रकाशित अनेक पुस्तकों की परियोजना से भी जुड़े रहे हैं.

डॉक्टर मुकुंद ख़ासतौर से 13वीं शताब्दी की इस पांडुलिपि की हालत देखकर काफ़ी व्यथित हुए और इसका डिजिटल रूप तैयार करने का बीड़ा उठाया.

डॉक्टर मुकुंद का कहना है, "इस तरह की पांडुलिपियाँ समय बीतने के साथ-साथ या तो लुप्त हो गईं या उनका हालत बेहद ख़राब हो गई."

इस महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ की डिजिटल प्रति तैयार करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसके ज़रिए सबसे पहले उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें ली जा रही हैं.

इस परियोजना के तहत इस ग्रंथ की इन डिजिटल तस्वीरों को किसी उपन्यास के आकार के रूप में भी तैयार करने की योजना है.

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