|
क्रिसमस टिकट पर हिंदू संगठन की नाराज़गी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
क्रिसमस के मौक़े पर ब्रिटेन में छपे एक डाक टिकट पर कई हिंदू संस्थाओं के प्रमुख संगठन ने आपत्ति व्यक्त की है. इस टिकट में एक हिंदू दम्पत्ति को शिशु ईसा मसीह को दुलारते दिखाया गया है. हिंदू फ़ोरम ऑफ़ ब्रिटेन ने इस टिकट को 'अपमानजनक' बताते हुए इसे हटा लिए जाने की मांग की है लेकिन ब्रिटेन की डाकसेवा रॉयल मेल ने इस पर खेद तो ज़ाहिर किया है लेकिन इसे वापस लेने से इंकार कर दिया है. इस टिकट पर तिलक लगाए एक पुरुष और माथे पर कुमकुम की बिंदी लगाए एक महिला के चित्र हैं. पुरुष वैष्णव हिंदू नज़र आता है तो महिला एक विवाहिता हिंदू स्त्री. यह मूल चित्र मुंबई की एक कला गैलरी में टंगा हुआ है और माना जा रहा है कि यह सत्रहवीं शताब्दी में बनाया गया था. रॉयल मेल के एक प्रवक्ता का कहना है, "उस काल के हिंदू चित्रकारों में इस तरह के चित्र बनाना सामान्य था जिनमें पाश्चात्य संस्कृति, विशेषकर ईसाई धर्म का चित्रण हो". "डाक टिकट भी इसी बात की चित्रण है कि एक हिंदू चित्रकार ने मरियम और शिशु ईसा को किस रूप में देखा". "लेकिन अगर इससे किसी की भावनाएँ आहत हुई हैं तो रॉयल मेल क्षमायाचना करता है". ढाई सौ से ज़्यादा हिंदू संस्थाओं को संगठन हिंदू फ़ोरम ऑफ़ ब्रिटेन के महासचिव रमेश कल्लिदाई कहते हैं, "रॉयल मेल मूल चित्र को 1620 ईस्वी में बनी कृति बताता है". "अगर यह सच भी है तो इसे ऐसे समय पर इस्तेमाल करना संवेदनशीलता के ख़िलाफ़ है जब भारत में धर्मपरिवर्तन से जुड़ा विवाद तूल पकड़ रहा है". "अगर हम मान भी लें कि 1620 ईस्वी में किसी चित्रकार को इस तरह की आज़ादी थी तो भी सवाल उठता है कि क्या वह इक्कीसवीं सदी में राजनीतिक और संवेदना की दृष्टि से जायज़ है"? उनकी मांग है कि यह टिकट वापस लिया जाए और इसे हिंदू चिन्हों को हटा कर फिर से जारी किया जाए. |
इससे जुड़ी ख़बरें सुनील गंगोपाध्याय के ख़िलाफ़ मुक़दमा06 मई, 2005 | भारत और पड़ोस बंगाल में उपन्यासकार के ख़िलाफ़ कार्रवाई05 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||