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सुनील गंगोपाध्याय के ख़िलाफ़ मुक़दमा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पश्चिम बंगाल के जाने-माने उपन्यासकार और कवि सुनील गंगोपाध्याय के ख़िलाफ़ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का मामला कोलकाता की एक अदालत ने स्वीकार कर लिया है. एक बंगाली अख़बार में सुनील गंगोपाध्याय के हवाले से हिंदू देवी सरस्वती की एक मूर्ति और उसके सौंदर्य के बारे में की गई टिप्पणी पर ये विवाद शुरु हुआ. उन्होंने कहा था कि देवी सरस्वती के सौंदर्य से प्रभावित होकर उन्होंने देवी की मूर्ति को चूमा था. सुनील गंगोपाध्याय बंगाल के सबसे जाने पहचाने कवि और उपान्यासकार है और उन्होंने 250 से अधिक किताबें लिखी हैं. भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के प्रमुख रह चुके बिभूति भूषण नंदी ने पुलिस में शिकायत की थी कि गंगोपाध्याय ने हिंदुओं की धार्मिक भावनाएँ को आहत किया है. नंदी का कहना था कि वे सरस्वती के पुजारी हैं और उनकी भावनाओं को ठेस पहुँची है क्योंकि गंगोपाध्याय ने सरस्वती की मूर्ति को 'अपवित्र' किया है. पहले पुलिस ने नंदी की शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया लेकिन जब वरिष्ठ अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया तो मामला दर्ज कर लिया गया. सुनील गंगोपाध्याय ने पहले स्पष्ट किया था कि इसका वर्णन उनकी आत्मकथा में है और ये तब की बात है जब वो 14 साल के थे और ये आत्मकथा पाँच साल पहले छपी थी. उनका कहना है कि यदि कोई इसे पूरा पढ़े तो समझेगा कि इसका हिंदू धर्म या मानसिक विकृति से कोई संबंध नहीं है. उन्होंने इस आरोप का खंडन किया था कि उनका मकसद सस्ती लोकप्रियता पाना नहीं है क्योंकि उनकी पुस्तकें पहले ही बहुत बिकती हैं. |
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