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उर्दू में छपी रामायणों का ज़ख़ीरा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ज़िंदगी के सातवें दशक की शाम उम्र बोझ, लंबी बीमारी, ख़त्म होती आँखों की रौशनी. इन सब के बावजूद दिल में एक तड़प के एक ऐसे विषय पर शोधकार्य किया जाए जिस पर कुछ काम ही न हुआ हो. कम ही लोग जानते हैं कि रामकथा और रामायण उर्दू में भी लिखी गई हैं और ये ख़ज़ाना भारत के अलग-अलग शहरों में फैला हुआ है. ये ही था वो शोध कार्य जिस पर अली जव्वाद ज़ैदी ने अपने जीवन के आखिरी दो दशक लगा दिए. उन्होंने देश के कोने-कोने से उर्दू-रामायण की छपी पुस्तकें, पांडुलिपियाँ जमा कीं और तकरीबन 160 ऐसी पुस्तकों की एक फ़ेहरिस्त भी बनाई. अफसोस की बात सिर्फ़ यह है कि वक़्त ने उनका साथ न दिया और इस फ़ेरहिस्त को पूरा करने और उसको एक पुस्तक की शक्ल देने का उनका सपना उनकी पलकों तले दब के रह गया. छह दिसंबर की सर्द शाम उर्दू के शायर, पत्रकार और शोधकर्ता ने सदा के लिए अपनी आँखें मूंद लीं. उर्दू में रामायण 1916 में उत्तरप्रदेश के एक छोटे कस्बे, गाजीपुर में जन्मे ज़ैदी ने अपने लम्बे साहित्यिक जीवन में लगभग 80 से ज़्यादा किताबें और अनगिनत लेख लिखे.
अपने आप को सिर्फ उर्दू तक सीमित न रखकर उन्होंने कई किताबें हिंदी, अंग्रेज़ी और फारसी में भी लिखीं. उनके इस शोध से पता चला कि उर्दू में लिखी रामकथाओं का एक ज़ख़ीरा है जो अलग-अलग शहरों में बिखरा है. इनमें कुछ छंद के रूप में है तो कुछ नाटक के. इन्हें लिखने वाले हिंदू भी हैं और कुछ मुसलमान भी. इस शोध से जानकारी मिली कि उर्दू में जो पहली रामायण छंदबद्ध रूप में लिखी गई थी वो लखनऊ के नवल किशोर प्रेस में लगभग 150 साल पहले मुद्रित-प्रकाशित हुई थी. इसे जगन्नाथ खुशरा ने लिखा था और उसे अदभुत रामायण का नाम दिया था. इसकी 50 प्रतियाँ छपी थीं. पहली रामायण संस्कृत से फारसी में मुगल बादशाह अकबर ने अनुवाद करवाई थी. ये काम मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूँनी ने किया था. रामचरित मानस पहली बार उर्दू में नवाब वाजिद अली शाह के ज़माने में छपी थी, रामायण का छंदबद्ध उर्दू अनुवाद पहली बार उर्दू अकादमी लखनऊ में छपा जिसे फिराकी साहब ने लिखा. ये सारी रामायणों के शीर्षक लिखने वालों के नाम से शुरू होते हैं - उदाहरण के तौर पर रहमत की रामायण, उल्फ़त की रामायण, फ़रहत की रामायण, मंज़ूम की रामायण. धुन आज़ादी की लड़ाई के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा और वहीं उन्होंने हिंदी सीखी और हिंदी में रामायण पढ़ी. उन्होंने तय किया कि कि वो जेल से छूटते ही उर्दू में रामायण पर शोध करेंगे-मगर इस काम को पूरी तरह शुरू करने में उन्हें समय लग गया. उन्होंने मुंशी दया नारायण निगम के "ज़माना" हकीक़त और "सरफ़राज" जैसे राष्ट्रीय उर्दू अखबारों में काम किया. 1946 में सूचना विभाग और बाद में केंद्रीय सूचना कार्यालय में भी काम किया. आकाशवाणी के प्रतिनिधि हैसियत से वे इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, कुवैत में भी रहे. उनके साहित्यक योगदान के लिए उन्हें 1988 में पद्मश्री से नवाजा गया. |
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