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जातिवाद से मुक्त लेखक रहे हैं प्रेमचंद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रेमचंद का उपन्यास 'रंगभूमि' रचना के 80 साल बाद विवादों में है. भारतीय दलित साहित्य अकादमी इस उपन्यास में जाति विशेष के लिए उपयोग किए गए कुछ शब्दों के खिलाफ है. संगठन ने प्रेमचंद के जन्मदिवस 31 जुलाई पर इस रचना की लगभग दो दर्जन प्रतियाँ दिल्ली के जंतर-मंतर पर जलाईं. इस विरोध प्रदर्शन पर क्या है साहित्यकार अशोक वाजपेयी की राय. बीबीसी हिंदी की संवाददाता सुशीला सिंह ने उनसे बातचीत की. रंगभूमि को बारहवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में जोड़े जाने को लेकर काफ़ी विवाद हो रहा है. संगठन राष्ट्रपति को ज्ञापन दे रहे हैं, आप क्या सोचते हैं इस बारे में? इसमें दो बातें है. एक, जो वर्ग वंचित और दलित लोगों का वर्ग है उसको ये लोकतंत्र में पूरा अधिकार है कि वो अगर किसी चीज़ को आपतिजनक मानता है तो ऐसी आवाज़ उठाए. यहाँ तक तो बात ठीक है, लेकिन इसमें सवाल ये है कि आप आपत्ति किसके बारे में उठा रहे हैं. सारा झगड़ा इस बात पर है कि आप प्रेमचंद के बारे में आपत्ति उठा रहे हैं. अब अगर प्रेमचंद को आप उनकी समग्रता में देखें, तो जो हमारी समझ है और जो उनके लाखों पाठकों की समझ है कि प्रेमचंद किसी तरह के जातिवाद, किसी तरह के धर्मोन्माद, किसी तरह की सांप्रदायिकता से मुक्त एक मानवधर्मी लेखक रहे हैं. उनकी मानवीयता जाति-लिंग और इस सब पर आधारित मानवीयता नहीं रही है. ये उनके साहित्य का मूल संदेश है, आखिर उनके कौन से पात्र हैं, जिनको हम याद करते हैं. होरी, जो बिल्कुल ग़रीब किसान है, जिसके पास कुछ भी नहीं है, जिसकी ज़मीन सारी ले ली गई है. 'कफ़न' के लोग या 'पूस की रात' के जो चरित्र हैं, ये सारे बहुत ही मुफ़लिस, ग़रीब, निचले तबके से आने वाले लोग हैं, इसलिए प्रेमचंद की जो समग्र दृष्टि है वो तो दलितों, शोषितों, वंचितों के पक्ष की दृष्टि है. उस दृष्टि को आप अनदेखा करके और कहीं-कहीं उन पर उन्होंने किसी शब्द का इस्तेमाल कर दिया है, इस पर लेकर आपत्ति करें, ये मुझे बात समझ में नहीं आती. इस पूरे विवाद पर पाठकों आपका क्या सोचना है. क्या रंगभूमि को पाठ्यक्रम में शामिल करने से वास्तव में जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा? या फिर मुंशी प्रेमचंद एक ऐसे कालजयी लेखक हैं जिनके लेखन पर इस तरह का विवाद निराधार और निरर्थक है? साथ लगे फ़ॉर्म पर अपनी राय हमें लिख भेजें. प्रेमचंद का तो कुछ बिगड़ता नहीं, प्रेमचंद के उपन्यासों की प्रतियाँ जला लीजिए, उस पर थूक दीजिए, उस पर प्रहार करिए, इसमें मुझे कोई शक नहीं है कि प्रेमचंद हमारे महान लेखकों में से हैं, महानता इन सबसे अप्रभावित रहती है. आप कुछ कर लीजिए, प्रेमचंद का तो कुछ बिगाड़ नहीं सकते, आप चाहे अपमान बड़ी बात कहिए, चाहे कुपाठ लिए, चाहे गलत व्याख्या करिए, चाहे जानबूझकर,लेकिन आप ऐसा कर क्यों रहे हैं. मुझे ये लगता है कि ये वर्ग जो भी है, जिन लोगों का, वो स्वयं दलित लक्ष्यों को इससे हानि पहुँचाएगा, उससे क्षति पहुँचाएगा क्योंकि समझदार लोगों के बीच में ये एक छवि या तस्वीर बनेगी कि ये लोग साहित्य को बहुत ही बड़ी सरसरी और बहुत ही सतही ढंग से पढ़ने वाले लोग हैं. और ये जब प्रेमचंद के साथ ऐसा कर सकते हैं, तो फिर और कौन बच सकता है. इसलिए ये मेरे हिसाब से खुद अपने लिए एक ग़लत तस्वीर पेश कर रहे हैं. पर इनका मानना है कि स्कूल में अगर ये पढ़ाया जाएगा तो ग़लत प्रचलन शुरु होगा, जो बच्चे हैं उनके ऊपर गलत प्रभाव पड़ेगा. बच्चे भी उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करने लगेंगे. हमने भी रंगभूमि पढ़ी है, हम पर तो प्रभाव नहीं पड़ा. प्रेमचंद के साहित्य का मुख्य संदेश ये नहीं है. जो बाद में याद रहता है वो ये थोड़े ही रहेगा, एक पूरा दुनिया बसाता है, एक लेखक, उस दुनिया में तरह-तरह के चरित्र होते हैं, आखिर ऐसे भी बहुत सारे चरित्र प्रेमचंद के हैं जो सवर्ण जातियों में घटिया हैं. लेकिन उससे क्या सवर्ण जातियों के घटिया होने का भाव रह जाता है लोगों के मन में. तो ये साहित्य को बहुत ही सतही ढंग से समझना है. मैं नहीं समझता कि बच्चों पर ऐसा बुरा असर पड़ेगा क्योंकि मुझ पर प्रभाव नहीं पड़ा मैं भी तो आखिर जब पढ़ा था रंगभूमि, तो मैं अपरिपक्व बुद्धि था. लेकिन मुझे तो ऐसा नहीं लगता. मगर विरोध करने वालों का कहना है कि इसे पाठ्यक्रम में नहीं डाला जाए. जिसे पढ़ना हो वो पढ़े मगर पाठ्यक्रम में डालने से सभी अनिवार्य रूप से पढ़ेंगे ही. मेरे हिसाब से वो दिन बहुत दुर्भाग्य का होगा जिस दिन प्रेमचंद को पाठ्यक्रम में इसलिए न पढ़ा जाए कि उसमें कुछ आपत्तिजनक है, ये बात मेरे गले नहीं उतरती. मैं इसको मानने को तैयार नहीं हूँ. प्रेमचंद के बारे में ऐसा नहीं हो सकता, कल को आप कहेंगे तुलसीदास को न पढ़ाइए, फिर आप कहेंगे कबीर न पढ़ाइए, फिर आप कहेंगे मुक्तिबोध को न पढ़ाइए, तो क्या पढ़ाएँ कचरा पढाइए? आखिर शेष साहित्य को पढ़ना भी बुनियादी अधिकार है और कक्षाओं में पढ़ना भी उनका अधिकार है. ये फैसला वो लोग कैसे कर सकते हैं, अगर छात्र ये कहें और अध्यापक मिल कर ये कहें और उनकी कोई आवाज़ उठे कि इससे ग़लत संदेश जा रहा है तब फिर भी विचार किया जा सकता है. ये लोग तो कौन हैं जो आवाज़ उठा रहे हैं. सिवाय इसके कि दलित होने के नाते उनका हक़ ज़रूर है. ये सही है कि एक लोकतंत्र में आपत्ति उठाने का हक है. लेकिन आपत्ति मेरे हिसाब से कोई अर्थ नहीं रखती. तो आपको क्या लगता है इसमें कहीं राजनीति खेली जा रही है. मैं तो जानता नहीं राजनीति की समझ मेरी बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती, लेकिन मुझे लगता है कि ये साहित्य का एक राजनीतिक दुरुपयोग ज़रूर है. ऐसे साहित्य का जो अपने आप में हमारी आधुनिक परंपरा का, ये कोई सैकड़ों साल पुराना नहीं, पचास-साठ-सत्तर साल पुराना है. उसका एक बहुत ही ग़लत पाठ है. और मैं इससे कतई सहमत नहीं हूं. |
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