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एक बाल कविता | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दो देशों के बीच मचा जब घोर महासंग्राम, दिन पर दिन बीते, आ गए लाखों सैनिक काम! कभी किसी का पलड़ा भारी कभी कोई बलशाली, होते होते एक देश का हुआ ख़ज़ाना ख़ाली! उसने राजदूत बुलवा कर भेजा एक प्रस्ताव, उत्तर आया इतने हाथी, इतने घोड़े दे दो,
राजा ने संदेश यह सुन कर दूतों को बुलवाया, कुछ दिन बीते, सैनिक लौटे, आए मुँह लटकाए, गली-गली और नगर-नगर की ख़ाक है छानी हमने, | इससे जुड़ी ख़बरें कीर्ति चौधरी की तीन कविताएँ22 सितंबर, 2006 | पत्रिका जया जादवानी की दो कविताएँ28 सितंबर, 2006 | पत्रिका कुँअर बेचैन के कुछ दोहे12 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका बालस्वरूप राही की गज़लें10 नवंबर, 2006 | पत्रिका विष्णु नागर की कविताएँ23 नवंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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