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बालस्वरूप राही की गज़लें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ग़ज़लें अक्ल ये कहती है, सयानों से बनाए रखना
लोग टिकने नहीं देते हैं कभी चोटी पर जाने किस मोड़ पे मिट जाएँ निशां मंज़िल के हादसे हौसले तोड़ेंगे सही है फिर भी शायरी ख़्वाब दिखाएगी कई बार मगर आशियाँ दिल में रहे आसमान आँखों में दिन को दिन, रात को जो रात नहीं कहते हैं एक बाज़ार है दुनिया जो अगर ‘राही जी’ **************************************
अचानक दोस्ती करना, अचानक दुश्मनी करना सभी जज़्बात को दीवानगी की हद समझते हैं अंधेरे आँधियाँ बनकर चिरागों को बुझाते हैं खिजाएँ ढूँढती फिरती हैं बाग़ों में बहारों को वफ़ा के नाम पर ‘राही’ चलन है बेवफ़ाई का ****************************************** बालस्वरूप राही | इससे जुड़ी ख़बरें भगवत रावत की कविताएँ02 नवंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस अचला शर्मा की कुछ कविताएँ26 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस यश मालवीय के नवगीत19 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस कुँअर बेचैन के कुछ दोहे12 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस असद ज़ैदी की तीन कविताएँ06 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस कीर्ति चौधरी की तीन कविताएँ22 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस अरुण कमल की तीन कविताएँ14 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस त्रिलोचन की दो कविताएँ07 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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