|
असद ज़ैदी की तीन कविताएँ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कविताएँ दूसरा हेमंत
कॉफ़ी होम में घुसते ही मुझे दिखाई दिया यह कम्बख़्त बिल्कुल नहीं बदला जैसी ही मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा - कॉफ़ी हाउसों में अक्सर इसी तरह हेमंत-- यह कैसे हो सकता था हेमंत अपने बाप की नक़ल बना फिरे तुम जो भी कोई हो -- क्या सचमुच हो? नृतत्त्वशास्त्री नृतत्त्वशास्त्र! इस काम में दिक़्क़त यह है कि अक्सर लोग इसकी बारीकियों को समझते नहीं. मोटे-मोटे सवाल पूछते और ख़ुलासा करते-करते आम आदमी तंग आ जाता है. आखिर क्यों नृतत्त्वशास्त्र? जवाब में एक रोज़ नाटकीय अंदाज़ में मैंने कहा : माट सहाब, जब तक इस दुनिया में नर और नारी हैं, जब तक नृ और तत्त्व हैं, तब तक शास्त्र रहेगा और शास्त्री लोग भी. पास खड़ी देहातिन बोली : ‘ तो शास्त्री जी, कछु शादी ब्याउ भी कराऔ?’ और अपने टूटे-फूटे दाँत दिखाती हुई हँसने लगी. उसकी ननद से भी रहा न गया : ‘अरी भौजाई, यो तो खुदई कुँआरे एँ. ये का करांगे शादी-आदी!’ कई लोग सस्वर हँसे थे : हा-हा, हो-हो, हा, हि-ही, हू! तो इस तरह परिहास के बीच चल रहा है अपना काम, फ़ील्ड रिसर्च. लोग मेरा अध्ययन ज़्यादा कर रहे हैं, मैं उनका कम. शनिवार
सुबह-सुबह जब मैं रास्ते में रुककर फ़ुटफाथ पर झुककर दिमाग सुन्न ऐनक फिसली जेब में रखे सिक्के खनके लड़का भी जानता था कि कहाँ के हो? मैंने दिखावटी रुखाई से पूछा ये शनि महाराज कौन हैं? इसके बाद मैंने छोड़ दी व्यापक राष्ट्रीय हित की चिंता ****************************************** | इससे जुड़ी ख़बरें जया जादवानी की दो कविताएँ28 सितंबर, 2006 | पत्रिका कीर्ति चौधरी की तीन कविताएँ22 सितंबर, 2006 | पत्रिका अरुण कमल की तीन कविताएँ14 सितंबर, 2006 | पत्रिका त्रिलोचन की दो कविताएँ07 सितंबर, 2006 | पत्रिका सम्बलपुर एक्सप्रेस28 सितंबर, 2006 | पत्रिका नींद में सपना, सपने में घर15 सितंबर, 2006 | पत्रिका कायांतरण08 सितंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||