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शुक्रवार, 06 अक्तूबर, 2006 को 08:44 GMT तक के समाचार
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असद ज़ैदी की तीन कविताएँ

कविताएँ

दूसरा हेमंत

रेखांकन - लाल रत्नाकर

कॉफ़ी होम में घुसते ही मुझे दिखाई दिया
हेमंत कोई तीस साल बाद- - वही चेहरा वही घुँघराले बाल
समझदारी और पलायन से भरी वही
शर्मीली हँसी
कोई युवती आहिस्ता-आहिस्ता उससे
कुछ कह रही थी
ऊपर नीचे कठपुतली की तरह सर हिलाते हुए
वह कह रहा था... अच्छा अच्छा!
जी...हाँ...एकदम- -बिल्कुल

यह कम्बख़्त बिल्कुल नहीं बदला
बेतकल्लुफ़ आवेग से मैं उसकी तरफ बढ़ा
उसने मुझे देखा और नहीं भी देखा
फिर उसी तरह सर हिलाने में मशग़ूल हो गया

जैसी ही मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा -
‘इस शहर में कब से हो हेमंत! ’
मैं जान गया यह हेमंत नहीं है
वह भी जान गया कि वह हेमंत नहीं है
एक बनावटी लेकिन उदार मुस्कुराहट से उसने
यह मामला रफ़ा दफ़ा किया

कॉफ़ी हाउसों में अक्सर इसी तरह
मंडराता रहता है अतीत
और घूमते रहते हैं कुछ खिसियाए हुए से
गंजे प्रेत
एक शाश्वत प्यास छिपाए हुए

हेमंत-- यह कैसे हो सकता था हेमंत
तीस साल तीस साल तो इस नौजवान की
उम्र भी नहीं है गाफ़िल!
यह उस हेमंत का बेटा भी नहीं हो सकता
इतना हमशक्ल होने पर कौन
कमअक़्ल होगा कि

अपने बाप की नक़ल बना फिरे

तुम जो भी कोई हो -- क्या सचमुच हो?
या यह भी एक दिवास्वप्न है हेमंत द्वितीय?

नृतत्त्वशास्त्री

नृतत्त्वशास्त्र! इस काम में दिक़्क़त यह है कि अक्सर लोग इसकी बारीकियों को समझते नहीं. मोटे-मोटे सवाल पूछते और ख़ुलासा करते-करते आम आदमी तंग आ जाता है. आखिर क्यों नृतत्त्वशास्त्र? जवाब में एक रोज़ नाटकीय अंदाज़ में मैंने कहा : माट सहाब, जब तक इस दुनिया में नर और नारी हैं, जब तक नृ और तत्त्व हैं, तब तक शास्त्र रहेगा और शास्त्री लोग भी. पास खड़ी देहातिन बोली : ‘ तो शास्त्री जी, कछु शादी ब्याउ भी कराऔ?’ और अपने टूटे-फूटे दाँत दिखाती हुई हँसने लगी. उसकी ननद से भी रहा न गया : ‘अरी भौजाई, यो तो खुदई कुँआरे एँ. ये का करांगे शादी-आदी!’ कई लोग सस्वर हँसे थे : हा-हा, हो-हो, हा, हि-ही, हू! तो इस तरह परिहास के बीच चल रहा है अपना काम, फ़ील्ड रिसर्च. लोग मेरा अध्ययन ज़्यादा कर रहे हैं, मैं उनका कम.

शनिवार

रेखांकन - लाल रत्नाकर

सुबह-सुबह जब मैं रास्ते में रुककर फ़ुटफाथ पर झुककर
ख़रीद रहा था हिंदी के उस प्रतापी अख़बार को
किसी धातु के काले पत्तर की
तेल से चुपड़ी एक आकृति दिखाकर
एक बदतमीज़ बालक मेरे कान के पास चिल्लाया--
सनी महाराज!

दिमाग सुन्न ऐनक फिसली जेब में रखे सिक्के खनके
मैंने देना चाहा उसको एक मोटी गाली
इतनी मोटी कि सबको दिखाई दे गई

लड़का भी जानता था कि
पहली ज़्यादती उसी की थी
और यह कि खतरा अब टल गया

कहाँ के हो? मैंने दिखावटी रुखाई से पूछा
और वो कम्बख़्त मेरा हमवतन निकला

ये शनि महाराज कौन हैं?
उसने कहा-- का पतौ... !

इसके बाद मैंने छोड़ दी व्यापक राष्ट्रीय हित की चिंता
और हिंदी भाषा का मोह
भेंट किए तीनों सिक्के उस बदमाश लड़के को.

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