 | | | रेखांकन: डॉ लाल रत्नाकर |
आछी के फूल मग्घू चुपचाप सगरा के तीर बैठा था बैलों की सानी पानी कर चुका था मैंने बैठा देखकर पूछा,बैठे हो, काम कौन करेगा. मग्घू ने कहा, काम कर चुका हूं नहीं तो यहां बैठता कैसे, मग्घू ने मुझसे कहा, लंबी लंबी सांस लो, सांस ले ले कर मैंने कहा,सांस भी ले ली, बात क्या है, आछी में फूल आ रहे हैं,मग्घू ने कहा,अब ध्यान दो,सांस लो, कैसी मंहक है. मग्घू से मैंने कहा,बड़ी प्यारी मंहक है मग्घू ने पूछा ,पेड़ मैं दिखा दूंगा,फूल भी दिखा दूंगा.आछी के पेड़ पर जच्छ रहा करते हैं जो इसके पास रात होने पर जाता है,उसको लग जाते हैं,सताते हैं,वह किसी काम का नहीं रहता. इसीलिये इससे बचने के लिये हमलोग इससे दूर दूर रहते हैं 7.10.2002 पीपल मिट्टी की ओदाई ने पीपल के पात की हरीतिमा को पूरी तरह से सोख लिया था मूल रूप में नकशा पात का,बाकी था,छोटी बड़ी नसें, वृंत्त की पकड़ लगाव दिखा रही थी पात का मानचित्र फैला था दाईं तर्जनी के नखपृष्ठ की चोट दे दे कर मैंने पात को परिमार्जित कर दिया पीपल के पात में आदिम रूप अब न था मूल रूप रक्षित था मूल को विकास देनेवाले हाथ आंखों से ओझल थे पात का कंकाल भई मनोरम था,उसका फैलाव क्रीड़ा-स्थल था समीरण का जो मंदगामी था पात के प्रसार को कोमल कोमल परस से छूता हुआ. 12.1.2003 | | |