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हिंदी को बचाने की कोशिश अमरीका में | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के बड़े शहरों में भले ही लोग हिंदी बोलने में आनाकानी करें लेकिन अमरीका में भारतीय मूल के लोग अपनी संस्कृति को क़ायम रखते हुए हिंदी भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देने की कोशिश में लगे हुए हैं. इसी के तहत समय-समय पर कवि सम्मेलन और गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है. इन कार्यक्रमों में हिंदी को प्रोत्साहन और विदेश में भी इस भाषा को कायम रखने की बात पर ज़ोर दिया जाता है. ऐसे ही एक कार्यक्रम का आयोजन न्यूयार्क में किया गया. हिंदू मंदिर के सभागार में आयोजित एक कवि सम्मेलन में हज़ारों लोग हिंदी भाषा के नाम पर जमा हुए. यह अपने आप में ही एक उपलब्धि थी. यह भीड़ इसलिए भी थी क्योंकि इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण थे हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि और फ़िल्मों के लोकप्रिय गीतकार पद्मश्री गोपालदास 'नीरज'. नीरज इन दिनो हिंदी के कवि सम्मेलनों के ज़रिए भाषा के प्रोत्साहन के मक़सद से अमरीका और कनाडा के दौरे पर हैं. न्यूयार्क में जब उन्होंने अपनी कविता का जलवा दिखाया तो लोग झूम उठे. नीरज के कई गाने अब भी लोगों की ज़बान पर बरबस ही आ जाते हैं, जैसे 'मेरा नाम जोकर' का गाना-- “ए भाई ज़रा देख के चलो आगे भी नहीं पीछे भी, ऊपर भी नहीं नीचे भी, ए भाई..... ” या फिर “और कारवाँ गुज़र गया... को कौन भूल सकता है," नीरज की भाषा सरल है इसलिए लोग इसे ज़्यादा पसंद करते हैं. भाषा नीरज की नीरज के लिए कहा जाता है कि उन्होंने गीत और संगीत की विभिन्न सहयोगी विधाओं की शास्त्रीय और व्यवहारिक शैलियों का मिश्रण कर भाषा की गुत्थियों को सुलझाया है. नीरज कहते हैं, “मेरी भाषा के प्रति लोगों की शिकायत रही है कि न तो वह हिंदी है और न उर्दू. उनकी यह शिकायत सही है और इसका कारण यह है कि मेरे काव्य का जो विषय मानव प्रेम है उसकी भाषा भी इन दोनों में से कोई नहीं है. ”
नीरज ने भारी संख्या में आए लोगों का अभिनंदन किया और कहा कि हिंदी के हित के लिए लोगों का जोश सराहनीय है. कवि सम्मेलन में नीरज को सुनने दूर दराज़ के इलाकों से लोग आए थे. राजस्थानी मूल के विनोद जैन 70 मील का सफर तय करके इस कार्यक्रम का आनंद लेने पहुंचे थे. जैन का कहना था “नीरज जी को साक्षात सुनना अपने आप में ही एक सौभाग्य है. इनकी कविताओं में वह कशिश है कि आप अपना आपा भूलकर इनकी कविताओं में खो जाते हैं. ” वह कहते हैं, "मैं 25 साल से अमरीका में हूँ लेकिन हिंदी का प्रेम कम नहीं हुआ है. हिंदी हमारी मातृभाषा है, और हम कहीं भी जाएँ हिंदी को हम नहीं भूल पाते हैं. मेरे बच्चे भी हिंदी मे ही बात करते हैं. इससे हमारा नाता कभी टूट ही नहीं सकता है.” अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था और नीरज के अलावा व्यंग्यकार सर्वेश अस्थाना ने भी अपने फ़न का कमाल दिखाया और अपने व्यंग्य से लोगों को हँसा हँसा कर लोट-पोट कर दिया. उन्होंने अपने आप को भी नहीं बख़्शा. उन्होंने कहा “हमको तो अपनी स्थिति बहुत टाप की लग रही है इस समय. नीरज जी के साथ होने से हमारी जितनी चर्चा हुई है उतनी तो हम अकेले आते तो ज़िंदगी भर नहीं होती ” नीरज और सर्वेश का यह क़ाफ़िला अमरीका और कनाडा के कई शहरों में घूम-घूम कर अपने फ़न के ज़रिए उत्तरी अमरीका में हिंदी को बढ़ावा देने की कोशिश करेगा. |
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