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शुक्रवार, 08 सितंबर, 2006 को 06:25 GMT तक के समाचार
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कायांतरण

कहानी

आधी रात का सन्नाटा. नींद में बेसुध पापा. सिरहाने की तरफ़ स्टूल पर बैठकर उनकी देखभाल करता हुआ आठ वर्षीय निमिष. उसी समय बाहर बरामदे की तरफ से आती हुई एक आवाज़. निमिष ने उठकर किवाड़ खोल दिया. चारों ओर नज़रें दौड़ाईं अचानक उसकी नज़र ऊँची काँचदार चारदीवारी पर जाकर ठहर गई. वहाँ से कोई मानवकृति फलांग कर इस पार आना चाह रही थी. निमिष ने निखरे हुए चाँद की रूपहली चाँदनी में साफ़-साफ़ देख लिया. उस मानवाकृति के पैरों से टप-टप कोई द्रव चू रहा था. निमिष ने दौड़कर अपने को उसके समीप पहुँचाया और धीरे से कहा,‘तुम वहीं रुको, मैं उतरने के लिए स्टूल लेकर आता हूँ. इतनी ऊँचाई से कूदने पर टांग टूट सकती है.’

रेखांकन: डॉ लाल रत्नाकर

वह आकृति हकबका कर रह गई. ज़रूर यह लड़का कोई चालाकी करना चाह रहा है. लेकिन जब तक वह आदमी कुछ निर्णय कर पाता निमिष दौड़कर एक स्टूल ला चुका था. वह आदमी तेज़ी से नीचे उतर गया और इसके पहले कि लड़के का मुंह दबाकर उसके हाथ-पैर बाँध देने की तत्क्षण सूझी अपनी युक्ति पर अमल करता, लड़के की बात सुनकर ठगा रह गया. लड़का अगले ही पल कह रहा था, ‘‘तुम्हारे पैर ज़ख्मी हो गए हैं, लेकिन तुम दर्द से रोना या कराहना नहीं, नहीं तो मेरे पापा की नींद खुल जाएगी. बड़ी मुश्किल से कई दिनों बाद आज उन्हें नींद आई है. मैं तुम्हारे लिए मरहम-पट्टी का सामान लेकर आता हूँ.’’ कहकर निमिष अंदर चला गया.

वह आदमी अवाक था. अजीब लड़का है. इसे यह तो पता है कि मैं कौन हूँ? क्या इसे इतनी समझ नहीं कि रात में दीवार से फांदकर अंदर आने वाला कौन होता है?

मरहम-पट्टी का सामान लाकर निमिष ने अपने अबोध हाथों से उसकी मरहम-पट्टी कर दी. वह आदमी अब और भी हैरान था. विचित्र जंतु है यह. कहीं दिमाग से पैदल तो नहीं है. अब तक तो इसे चिल्लाकर पूरे मोहल्ले को जगा लेना चाहिए था. लेकिन यह है कि मरहम...पट्टी...दया...सहानुभूति... उसने कुछ पूछ दिया, ‘‘तुम मेरे लिए यह सब कर रहे हो तुम्हें मालूम है मैं कौन हूँ?’’

निमिष ने उसकी घबराई आँखों में गहरे तक झाँका और निर्द्वंद्व भाव से कह उठा,‘‘हाँ मैं जानता हूं, तुम चोर हो. लेकिन मैं चिल्ला नहीं सकता, चूंकि मेरे बीमार पापा को आठ रोज बाद नींद आई है. डॉक्टर अंकल ने कहा है कि इन्हें नींद लगे तो किसी भी तरह बीच में टूटने न पाए. तुम चोर हो मगर तुम्हारे पैर जख़्मी हो गए हैं. पापा ने मुझे सिखाया है कि आदमी कोई भी हो, कैसा भी हो, अगर वह तकलीफ़ में है तो उसकी मदद करनी चाहिए.’’

 चोर अंकल, तुम विश्वास करो मैं शोर नहीं मचाऊंगा. घर के सामानों से मेरे बीमार पापा की नींद कहीं ज़्यादा महँगी है. ऐसे भी जहाँ मम्मी गई हैं, वहां पापा को भी चले जाना है और मुझे भी. सामान तो यहीं रह जाएगा

वह आदमी जो चोर था, उसके भीतर का बुरा और सख़्त आदमी मानों जरा सा हिल गया. निमिष की नेकी, उसका बचपना और उसके भोलेपन ने चोर के इरादे के समक्ष एक चुनौती खड़ी कर दी. उसने झिझकते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारे घर में क्या सिर्फ़ तुम्हारे पापा हैं?’’

‘‘हाँ सिर्फ़ पापा.’’ निमिष का स्वर बेचारगी से अत्यंत बोझिल था.

‘‘और मम्मी?’’

‘‘मम्मी को मैंने देखा नहीं, पापा कहते हैं कि वे बहुत पहले हमें छोड़कर ऐसी जगह चली गईं जहां से कोई वापस नहीं आता. पापा यह भी कहते हैं कि वह ऐसी जगह हैं कि एक दिन वे भी वहाँ चले जाएंगे और फिर बाद में मैं भी.’’

चोर के भीतर हिलने-डुलने की क्रिया में भी तेज़ी आ गई तथा उनके चेहरे पर अनुराग की एक परछाई उभर आई. स्वर में मिठास भर कर पूछा उसने, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘मेरा नाम निमिष है. मगर यह सब क्यों जानना चाहते हो? सुनो, अब तुम हमारे घर से जो-जो चीज़ें ले जाना चाहते हो, ले लो और गेट से चले जाओ. मैं ताला खोल देता हूँ... ऊपर से फलांगना अच्छा नहीं. दीवार पर कांच के टुकड़े गड़े हुए हैं...तुम्हारे पैर फिर जख़्मी हो सकते हैं. ’’ निमिष ने आहिस्ता से समझाते हुए कहा.

 चोर अंकल, अगर मुझसे कोई ग़लती हो गई हो तो माफी दे दो. मैं बच्चा हूं न. मुझे बड़े आदमी से सलूक करना नहीं आता...किस बात को कैसे कहना है मैं नहीं जानता... ख़ासकर चोर से तो बिल्कुल नहीं. विश्वास करो मैं अपनी आँखों से पहली बार चोर देख रहा हूँ

चोर को लगा जैसे किसी ने उस पर जादू चला दिया हो. उसने कहा ‘‘नहीं निमिष, अब मैं तुम्हारे घर में चोरी नहीं करूंगा. एक अर्से से मैं चोरी कर रहा हूँ, लेकिन ऐसी परिस्थिति कभी नहीं आई जब घरवाला जागकर ख़ुद कहे कि जो ले जाना है, ले जाओ. यह तो फिर चोरी नहीं हुई.’’

‘‘चोर अंकल, तुम विश्वास करो मैं शोर नहीं मचाऊंगा. घर के सामानों से मेरे बीमार पापा की नींद कहीं ज़्यादा महँगी है. ऐसे भी जहाँ मम्मी गई हैं, वहां पापा को भी चले जाना है और मुझे भी. सामान तो यहीं रह जाएगा.’’

निश्छल बाल-वृत्ति पर चोर बुरी तरह पराजित हो गया. दया से उसकी आँखें भीग आईं. निमिष उसकी आंखों में आँसू देखते ही अंदर को दौड़ पड़ा. दूसरे ही क्षण वह लौटा तो उसके हाथों में एक कैप्सूल, दो-चार स्लाइस ब्रेड और एक गिलास पानी था. उसने कहा,‘‘शायद तुम्हारे जख़्म का दर्द बढ़ गया है, तुम इसे खा लो. पापा के दर्द के लिए डॉक्टर अंकल ने दिया है. भूख लगी हो तो ये ब्रेड खा लो. और तो मेरे घर में कुछ है नहीं. दरअसल मुझे खाना बनाना नहीं आता न. एक नौकर था वह दस रोज़ पहले घर का कुछ सामान लेकर दिन में ही भाग गया. तब से मैं ऐसे ही ब्रेड खा लिया करता हूँ. कभी डॉक्टर अंकल कुछ ला देते हैं तो कभी पड़ोस की आंटी रोटी वगैरह दे जाती हैं. दो दिन से शायद वे भी कहीं चली गई हैं.’’ निमिष यों बता रहा था जैसे अपने किसी गुनाह की सफाई दे रहा हो.

चोर को लगा कि जैसे उसके अंदर कोई अलाव जल उठा है, जिसमें उसकी सारी रद्दी, सारा कूड़ा जलकर राख होने लगा. समाज का एक बुरे और घृणित आदमी के साथ ऐसा साधु बर्ताव! उसकी आंखों में आंसू की धार और भी तेज़ हो गई. निमिष समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है. वह विचलित हो उठा और बहुत पसीजकर खुशामद भरे लहजे में मनाने की अदा से कहने लगा, ‘चोर अंकल, अगर मुझसे कोई ग़लती हो गई हो तो माफी दे दो. मैं बच्चा हूं न. मुझे बड़े आदमी से सलूक करना नहीं आता...किस बात को कैसे कहना है मैं नहीं जानता... ख़ासकर चोर से तो बिल्कुल नहीं. विश्वास करो मैं अपनी आँखों से पहली बार चोर देख रहा हूँ.’

चोर में अब और खुद को रोकने का सामर्थ्य नहीं था. उसने निमिष को अपनी गोद में उठाकर गले से लगाते हुए चूम लिया. भरे गले से कहा ‘‘भैया निमिष. तुम्हें जो सलूक का ढंग आता है वह तो बड़े-बड़े ऋषि मुनियों को भी नहीं आया होगा. अब मैं इस घर से नहीं जाऊंगा. तुम्हारे पापा जब जाग जाएँगे तो उनसे मैं एक विनती करूंगा.’’

विस्मय करते हुए निमिष ने पूछा, ‘क्या’

‘‘यही कि आपके घर से एक नौकर चोर बनकर भाग गया था और अब एक चोर आकर नौकर बन जाना चाहता है.’’

निमिष फटी-फटी आंखों से उस चोर को देखते हुए सोचने लगा कि पापा के जागने पर वह पूछेगा कि ऐसा क्यों हुआ?

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