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'प्रेमचंद की प्रासंगिकता बनी रहेगी' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर प्रेमचंद के विकास को देखें तो उनकी शुरू की कहानियाँ भावुकता और राष्ट्रवाद की कहानियाँ हैं. मतलब कहीं-कहीं उसमें हिंदुत्व का आग्रह भी है. लेकिन धीरे-धीरे वो ज़िदगी के ज़्यादा निकट आते जाते हैं, हमें उनमें एक ख़ास तरह की प्रगतिशील चेतना दिखाई देती है. इसकी वजह यह है कि 20वीं शताब्दी के बाक़ी जो उनके समकालीन लेखक थे, वो उनकी तरह के नहीं थे. वे उर्दू की पृष्ठभूमि से आए थे तो उनके साथ सिर्फ़ दो भाषाएं ही नहीं थी, दो सांस्कृतिक परंपराएँ भी थीं. संस्कृतियों का एक सम्मिलित रूप था. इसलिए उनके अंदर यह निहित था कि वे कट्टर हिंदू नहीं हो सकते थे. उदार और मानवतावादी संस्कृतियाँ उनकी पूंजी थी. जिसे हम प्रेमचंद की प्रगतिशीलता कहते हैं. वे जो दबे, कुचले, शोषित वर्ग हैं जिनकी आवाज़ कोई नहीं सुनता था, जिनके बारे में कोई बोलता नहीं था उन्होंने उसके बारे में लिखना शुरु किया. मध्यवर्ग के लोगों में साहित्य सीमित था उससे उन्होंने हमारे कथा साहित्य को बाहर निकाला. महिलाएँ, दलित, शोषित जिनकी आवाज़ कभी नहीं सुनी जाती थी, उन लोगों की आवाज़ को बाहर निकाला. इसलिए हम लोग उन्हें प्रगतिशील कहते हैं. शुरू की उनकी चेतना गाँधीवाद से प्रेरित थी, यह हम सब जानते हैं. वे जिन समस्याओं का हल करना चाह रहे थे चाहे वो खेतिहर किसानों की समस्या हो, राष्ट्रीयता की समस्या हो, वो सब उसी तरह से ले रहे थे जैसे गाँधीजी ले रहे थे. प्रगतिशीलता लेकिन जैसे-जैसे वे समाज में गहरे उतरते गए, उन्हें लगा गाँधीवाद पूरी तरह से समस्याओं का हल नहीं कर सकता, क्योंकि गाँधीजी वर्णव्यवस्था के पक्षधर थे. गाँधीजी पूंजीपतियों के ट्रस्टीशिप के पक्षधर थे. गाँधी मूलभूत सामाजिक संरचना को बदलना नहीं चाहते थे. उन्होंने सारा सुधार आदमी की मनुष्यता पर विश्वास करके किया कि इसको बदला तो समाज बदल जाएगा. जबकि वास्तविकताएँ यह है कि ये सारे संबंध आर्थिक हैं. जब तक आर्थिक ढाँचा नहीं बदलेगा, पूंजीवाद नहीं बदलता है, तब तक समाज में वो परिवर्तन नहीं होंगे. प्रेमचंद आज भी सामाजिक लगते हैं कि क्योंकि उन्होंने समाज के आधारभूत सुधारों को रेखांकित किया, जबकि गाँधीवाद असफल हो चुका है. वह सिर्फ़ सजावट की चीज़ और एक समारोह की चीज़ ज़्यादा रह है. यही वजह है कि आज भी समस्याएं हमारे सामने विकराल हैं और प्रेमचंद का गाँधीवाद से मोहभंग हुआ. हम उनकी आख़िरी कहानियों में चाहे वह क़फ़न,पूस की रात, सदगति, ठाकुर का कुआँ हो, सबमें गाँधीवाद का रिजेक्शन है. गोदान सबसे बड़ा रिजेक्शन है. गाँधीवादी वे एक अवधि तक रहे थे, उसके बाद वो गाँधीवादी नहीं थे. उसके बाद वे मार्क्सवाद के ज़्यादा क़रीब आ गए थे. प्रासंगिकता जब तक भारतीय समाज नहीं बदलेगा, तब तक प्रेमचंद प्रासंगिक रहेंगे. प्रेमचंद के बिना हम समाज को नहीं समझ सकते. आज भी स्थिति वैसी ही है, किसान आत्महत्या कर रहे है, हरियाणा के गुड़गाँव में बेकार मज़दूर आंदोलन के दौरान घायल होते हैं. यही स्थितियाँ थी प्रेमचंद की रंगभूमि में, तो प्रेमचंद्र कैसे अप्रासंगिक हो जाएंगे. प्रेमचंद्र को जो स्थान मिलना चाहिए था, वह मिला है और वह आगे और महत्वपूर्ण होता जाएगा. (आशुतोष चतुर्वेदी से बातचीत पर आधारित) |
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