BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
मंगलवार, 30 अगस्त, 2005 को 12:11 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
प्रेमचंद को गुलज़ार ने कैसे जाना
गुलज़ार
एक समारोह में प्रेमचंद पर अपनी कविता पढ़ी गुलज़ार ने
गुलज़ार ने हाल ही में दूरदर्शन के लिए प्रेमचंद की बीसियों कहानियों को एक श्रंखला के तौर पर फ़िल्माया है. उन कहानियों के संवाद और स्क्रिप्ट लिखने के साथ साथ उन्होंने इन का निर्देशन भी किया है.

प्रेमचंद की 125वीं जयंती वर्ष के मौक़े पर आयोजित एक समारोह के दौरान मिर्ज़ा एबी बेग ने गुलज़ार से मुलाक़ात की और प्रेमचंद से जुड़ी उनकी यादों को उन्ही की ज़ुबानी सुना.

'प्रेमचंद से जीवन में मेरी मुलाक़ात तीन बार हुई है, एक बार उस समय जब मैं ने अपने पिता को देखा कि वह मेरी तीसरी क्लास की उर्दू की किताब से माँ को एक कहानी सुना रहे हैं और दोनों रो रहे है.

 ईदगाह पढ़ी तो लगा कि यह तो अपनी ज़िंदगी से बहुत क़रीब है, उसे पढ़ के एसा लगा कि अगर हम भी मेले गए होते तो मैंने भी हामिद की तरह चिमटा ही खरीदा होता.
गुलज़ार

वह कहानी प्रेमचंद की ‘हज्जे अकबर’ थी. उसके बाद मेरी माँ मुझे हमेशा वह कहानी पढ़ के सुनाने को कहती और पढ़ते पढ़ते हम इतना रोते कि कहानी अधूरी रह जाती. यह कहानी आज तक हम दोनों से पूरी पढ़ी ना जा सकी.

यह वह पल था जब मुंशी प्रेमचंद ने पहली बार मुझे छुआ. फिर ईदगाह पढ़ी तो लगा कि यह तो अपनी ज़िंदगी से बहुत क़रीब है, उसे पढ़ के ऐसा लगा कि अगर हम भी मेले गए होते तो मैंने भी हामिद की तरह चिमटा ही खरीदा होता.

प्रेमचंद से मेरी दूसरी मुलाक़ात कॉलेज में हुई जब मैंने कई अलग-अलग तरह के लेखकों को पढ़ा. प्रेमचंद को मैंने हिंदी और उर्दू दोनों में पढ़ा और उन्हें फिर से पढ़ा तो पता चला कि इसका एक और भी पहलू है, यानी सामाजिक पहलू.

अगर कोई किरदार ऐसा है तो क्यों है? यह है वह दूसरा लेवेल जहाँ हम प्रेमचंद से मिलते हैं.

प्रेमचंद से तीसरी बार उस समय मिला जब गोदान और ग़बन पर फिल्में बनीं, यानी एक फ़िल्मकार की हैसियत से अब जाकर हमारी मुलाक़ात प्रेमचंद से हुई.

प्रेमचंद
अनेक साहित्यकार प्रभावित हुए हैं प्रेमचंद से

हम किसी भी साहित्यकार से कई स्तर पर मिलते हैं, ग़ालिब से उस वक़्त मिले जब मौलवी साहब शेर पढ़ते और मतलब बताते और कहते कि चचा ने कहा है, उस समय ग़ालिब हमें चचा ही लगते थे, फिर जब बड़े होकर ग़ालिब को पढ़ा तो उनकी शख़्सियत हमारे ऊपर खुलती गई.

टेलीविज़न सीरीज़ के लिए प्रेमचंद की कहानियाँ चुनते वक़्त हमने दो चीज़ों को ध्यान में रखा, ऑडियो और विज़ुअल. इन दोनों को ही सामने रख कर हमने प्रेमचंद की कहानियों का इंतिख़ाब किया. और दूसरे यह कि आज उसका क्या प्रासंगिकता है.

मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जैसे सौ साल पहले थीं.

यह बात एक लेखक के लिए प्रतिष्ठा की बात है कि उसकी कहानियाँ सौ वर्ष बाद भी जीवित हैं, लेकिन सामाजिक तौर पर यह अफ़सोसनाक बात है कि वे हालात अभी तक नहीं बदले, ग़रीबी अब भी वैसी ही है जैसी कि प्रेमचंद ने बयान की थी.

मैं प्रेमचंद को इसलिए भी क़रीब पाता हूँ क्योंकि मेरा और उनका हिंदू-मुसलमान का साझा कल्चर है. उनके यहाँ किसान किसान था, हिंदू या मुसलमान नहीं.

अब 'नमक का दरोग़ा' को ही ले लें, इस में दो सिपाही हैं वज़ीर ख़ान और बदलू सिंह, यहाँ सिपाही सिपाही है उसका हिंदू या मुसलमान होना नहीं नज़र आता है.

मेरी फ़िल्मों में भी ऐसा ही है, मेरी फिल्म 'लेकिन' में अमजद साहब जब नमाज़ पढ़ने जाते हैं तो उस वक़्त पता चलता है कि अच्छा यह मुसलमान हैं और इनकी बीवी हिंदू है, बड़ा ख़ूबसूरत है यह हमारा मिलाजुला कल्चर.

हालाँकि प्रेमचंद को पढ़ते पढ़ते मैं कई जगह उन से उलझ गया कि क्या एक ही तरह के पात्र को बार बार ले आते हैं. और मेरी यह कविता प्रेमचंद से उसी टकराव को ज़ाहिर करती है'.

कविता
प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है
लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ़ बहुत है...

66प्रेमचंद पर विशेष
कलम के सिपाही प्रेमचंद की 125 वीं जयंती पर बीबीसी हिंदी की विशेष प्रस्तुति.
66प्रेमचंद और महादेवी
कवयित्री महादेवी वर्मा ने लिखा है कि प्रेमचंद को लेकर वे क्या सोचती थीं
66पहले प्रगतिशील लेखक
नामवर सिंह का कहना है कि प्रेमचंद ने कबीर की परंपरा का विकास किया.
66समय बदल गया है
निर्मल वर्मा मानते हैं समय बदलने के बाद भी प्रेमचंद की परंपरा बची हुई है.
66प्रेमचंदः सच्चे सिपाही
कलम के सिपाही प्रेमचंद का निजी जीवन भी संघर्ष और बग़ावत का रहा है.
इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>