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'प्रेमचंद का एक अखिल भारतीय दृष्टिकोण था' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अब युद्ध का स्वरूप बदल गया है तो प्रेमचंद का यह कथन एक बदले हुए रुप में सच है कि बड़े व्यापारिक फ़ायदे के लिए बड़े युद्ध लड़े जाते हैं, क्योंकि युद्ध अब सिर्फ़ मैदान पर या हथियार के बल पर नहीं लड़े जा रहे वे पूँजी और संस्कृति के रास्ते से लड़े जा रहे हैं. मुझे लगता है कि यह जो नया युद्ध है उसका प्रभाव ज़्यादा सूक्ष्म, व्यापक और टिकाऊ है. इसी तरह प्रेमचंद की यह अवधारणा भी सही दिखाई देती है कि राष्ट्र सरोकारों के बिना नहीं बन सकता. प्रेमचंद ठीक कहते थे कि जब तक जनता में राष्ट्र होने की या राष्ट्र बनने की भावना नहीं है तब तक वह राष्ट्र नहीं हो सकता. हमनें यूगोस्लाविया का विघटन देखा और उससे पहले हमने सोवियत संघ का विघटन देखा था.हम और भी कई विघटनकारी आंदोलन देख रहे हैं जिसमें जनता अपने आपको उस राष्ट्र का हिस्सा नहीं मानती जिसका उसे हिस्सा माना जाता है. वह जनता अलग होने के लिए क्या कुछ नहीं करना चाहती. तो राष्ट्र मूल रुप से एक बौद्धिक, भावनात्मक और सांस्कृतिक बुनावट है. भूगोल पर तो कह सकते हैं कि 1947 से पहले भारत एक था, लेकिन इसी भारत के तीन टुकड़े हो गए यानी तीन मानसिकताएँ थीं. अगर हम एक मानसिकता एक नहीं कर पाएँगे तो राष्ट्र के टुकड़े होते जाएँगे. हिंदुओं में जातियों ने जो कहर बरपा किया है उसमें राष्ट्र का कोई मतलब नहीं रह जाता वहाँ फिर जाति, उपजाति और उप-उपजाति का मामला रह जाता है. हमारे देश के भीतर तो एक महाराष्ट्र है और एक अंचल का नाम सौराष्ट्र है. तो जब तक आप लोगों में राष्ट्र की भावना नहीं ला पाते तो भारत को एक रखना कठिन होगा. भारत सांस्कृतिक इकाई तो थी लेकिन उसे भौगोलिक रुप से एक होने में बहुत समय लगा. इसे एक होने के लिए एक हज़ार साल तक मुस्लिम साम्राज्य को यहाँ रहना पड़ा और उसके बाद दो सौ साल अंग्रेज़ों का साम्राज्य रहा. और इसके बाद पुरातन और आधुनिक का जो संघर्ष हुआ उसके कारण हमने एक राष्ट्रीय अस्मिता पाई. इसलिए प्रेमचंद का यह मानना सही दिखाई देता है कि राष्ट्र दरअसल हमारे मन में होता है. रचना का राष्ट्र प्रेमचंद का यह राष्ट्र निश्चित तौर पर उनके लेखन में भी दिखाई देता है. प्रेमचंद उत्तर भारत के थे तो उनको उत्तर भारत जितना आता था, उन्होंने लिखा. लेकिन एक बात उनके समय में हुई थी. 1936 का प्रगतिशील लेखक संघ का इतिहास देखें तो एक बात अद्भुत यह दिखाई देती है कि पूरे भारत के, कोने-कोने के साहित्यकारों ने एकमत होकर कहा था कि संगठन का अध्यक्ष अगर कोई होगा तो प्रेमचंद होंगे. ऐसी सर्वसम्मति आज भारत के किसी लेखक को लेकर नहीं है और हो भी नहीं सकती. लगता है कि वो सर्वसम्मति आज शायद अनंतमूर्ति को लेकर हो जाए या बांग्ला के किसी लेखक को लेकर हो जाए लेकिन अगर आप कहें कि श्रीलाल शुक्ल अखिल भारतीयता के प्रतीक हैं तो ऐसा हो नहीं सकता. प्रेमचंद के मन में वाकई एक राष्ट्र था जिसकी कल्पना उन्होंने हंस में की थी. अगर आप हंस का संपादन मंडल देखें तो उसमें छह भाषाओं के बड़े लोग थे. यानी हंस उस समय सही मायने में एक अखिल भारतीय पत्रिका थी जो पूरे भारत की दृष्टि को लेकर चलता था. इसलिए इसमें कोई शक नहीं है कि प्रेमचंद के मन में जो अखिल भारत की छवि थी उसकी सीमा नर्मदा के दक्षिण में ख़त्म नहीं हो जाती थी या जिसकी गंगा और जमुना के पार ख़त्म नहीं हो जाती थी. हम यह भी न भूलें कि वे उर्दू की पृष्ठभूमि से आए थे. उनके पिता अरबी-फ़ारसी जानते थे और वे स्वयं भी फ़ारसी के जानकार थे. उनकी पहला लेखन तो ऊर्दू में है. तो उनको विरासत में वो चीज़े मिलीं जो अखिल भारतीय थी. फ़ारसी उसी समय एक अखिल भारतीय भाषा होकर ख़त्म हुई थी. अगर मैं यह कहूँ और ग़लत न समझा जाऊँ तो कहना चाहूँगा कि वे ब्राह्मण भी नहीं थे और एक ऐसी जाति से थे जिसे शूद्र माना जाता है इसलिए उनके भीतर वो जातिवाद भी नहीं था. एक तरफ़ वो भाषा से ऊपर उठे हुए थे और दूसरी ओर वे जाति से ऊपर उठे हुए थे. वे उर्दू दाँ तो थे ही. आज भी लोग मानते हैं कि उर्दू के तीन साहित्यकार हुए, जिन्होंने उर्दू को बदल डाला है, मुस्लिम समाज को बदल डाला है. एक तो सर सैयद अहमद, दूसरे इक़बाल और तीसरे प्रेमचंद. मैं मानता हूँ कि प्रेमचंद के भीतर सही मायने में अखिल भारतीय दृष्टिकोण था. वे कई मायनों में रवींद्र नाथ से ज़्यादा अखिल भारतीय थे. उनका भी दृष्टिकोण अखिल भारतीय था लेकिन वह ज़मीनी नहीं था, उसमें किसान नहीं आता था. वे उच्च वर्ग और उच्च मध्यवर्ग के नीचे जा ही नहीं सकते थे. कारण भी थे वे उस ज़माने में करोड़पति थे और प्रेमचंद एक साधारण स्कूल मास्टर थे. प्रेमचंद का राष्ट्र सही मायने में राष्ट्र था, वह राष्ट्र के लोगों के साथ था. रवीन्द्र नाथ की तरह पंजाब-सिंध-गुजरात मराठा वाला सिर्फ़ भौगोलिक भारत नहीं था. त्रासद सवाल यह सवाल कि कितने लोगों ने इस अखिल भारतीय दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया एक त्रासद सवाल है और पेचीदा भी. मैं अभी 1907-08 की सरस्वती की फ़ाइल देख रहा था. मालूम पड़ता है कि आज़ादी तक हमारे सारे बुद्धिजीवी भारत को बहुत जानते थे. पुरानी पत्रिकाओं को देखने से पता चलता है कि दक्षिण भारत के सारे नाम सही लिखे हुए हैं, दक्षिण भारतीय संस्कृति के बारे में सही लिखा हुआ मिलेगा. एक वजह यह भी थी कि हिंदी देश की सबसे बड़ी भाषा थी. सबसे बड़ा राजनीतिक नेता गाँधी था और वह हिंदी में बात कर रहा था, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और राजेंद्र बाबू सब हिंदी में बोल रहे थे. लेकिन आज़ादी के बाद जो प्रगति की बात आई तो क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा भी उभरने लगी. अंग्रेज़ों ने क्षेत्रीयता को रौंद डाला था और आज़ादी के बाद जब क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल उठने लगा तो लोगों ने किसी एक भाषा को या किसी एक साहित्यकार या भाषा का वर्चस्व स्वीकार करने से इंकार कर दिया. और यह समस्या अभी तक बनी हुई है और इसका हल जब तक नहीं निकलेगा, तब तक कोई अखिल भारतीय दृष्टिकोण नहीं उभर सकता. (विनोद वर्मा से बातचीत के आधार पर) |
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