 |  |  | |  | | | विश्वनाथ त्रिपाठी कहते हैं कि प्रेमचंद को आज भी इसलिए पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि वह अपने समय के इतिहास का जीवंत विवरण देते हैं. | | |
| |  |  |  | |  | | | लेखक-समीक्षक सुधीश पचौरी मानते हैं कि हिंदी समाज ने प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने की जगह उनके नाम पर दुकान चलाकर मलाई खाई गई. | | |
| |  |  |  | |  | | | मन्नू भंडारी का कहना है कि लेखक की रचना दृष्टि की प्रासंगिकता पर ध्यान देना चाहिए, इस तरह से प्रेमचंद इस समय भी प्रासंगिक दिखाई देते हैं. | | |
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