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'प्रेमचंद को याद करने का तरीक़ा बदलें' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रेमचंद के पौत्र आलोक राय मानते हैं कि एक तो यह कहना ठीक नहीं है कि प्रेमचंद के साथ हिंदी समाज ने विश्वासघात किया और यदि हुआ भी तो हो सकता है कि इसकी शुरुआत ख़ुद प्रेमचंद ने की थी. वे कहते हैं कि अपने जीते-जी प्रेमचंद नहीं जान सके कि वे महान होने वाले हैं और उन्होंने अपनी चीज़ों का संचय नहीं किया, सब बिखरा सा रहा. बीबीसी हिंदी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'आपकी बात बीबीसी के साथ' में श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए आलोक राय ने इस बात से इनकार किया कि प्रेमचंद की विरासत को संभालने में उनके परिजनों ने लापरवाही बरती. कुछ श्रोताओं और सुपरिचित समीक्षक सुधीश पचौरी के आरोप का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि आरएसएस के एक कार्यकर्ता को प्रेमचंद की धरोहर किसी ने नहीं सौंपी बल्कि उन्होंने छल करके उसे चुरा लिया. उन्होंने कहा, "यह कहना ठीक नहीं है कि परिवारवालों ने कुछ नहीं किया, मेरे पिता अमृत राय ने अपने पिता (प्रेमचंद) की जीवनी लिखी. उनके लेखों और पत्रों का श्रम करके संग्रह किया." मकान के विवाद पर उन्होंने कहा कि संपत्तियों को लेकर पारिवारिक विवाद जिस तरह होते हैं उस पर वे टिप्पणी नहीं करना चाहते. व्यक्तिगत संग्रहालय न बनाएँ उन्होंने कहा कि वैसे भी मकान का विवाद सिर्फ़ ईंट गारे का विवाद नहीं है.
आलोक राय का कहना था कि वे नहीं चाहते कि प्रेमचंद के गाँव लमही में उनके नाम पर कोई संग्रहालय बनाकर रख दिया जाए. उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति ज़ाहिर की कि प्रेमचंद को याद करना एक पारंपरिक आयोजन जैसा हो गया है, उसके बाद कुछ नहीं होता. आलोक राय ने कहा, "व्यक्ति-पूजा बंद की जानी चाहिए और प्रेमचंद को याद करने का तरीक़ा बदला जाना चाहिए." उन्होंने एक श्रोता के सवाल के जवाब में इस बात से इनकार किया कि प्रेमचंद की रचनाओं का प्रकाशन कम हो रहा है. उनका कहना था कि बीस बरस पहले कॉपीराइट हट जाने के बाद से तो हर प्रकाशक प्रेमचंद की रचनाएँ छाप रहा है. उन्होंने एक अन्य सवाल के जवाब में स्वीकार किया कि रबींद्र नाथ की कृतियों की तरह प्रेमचंद की रचनाओं का प्रकाशन स्तरीय ढंग से नहीं हो रहा है. उनका कहना था कि हर आदमी सस्ती किताब ख़रीदना चाहता है तो स्तरीय एडीशन नहीं आता, तो कमी तो कहीं पाठकों में ही है. उन्होंने हिंदी के जाने माने समालोचक नामवर सिंह की इस टिप्पणी से सहमति जताई कि जो संस्करण हो रहे हैं वे घटिया हैं. दूरी प्रेमचंद से हिंदी पाठकों की दूरी के सवाल पर आलोक राय का कहना था कि वे मानते हैं कि पाठकों और प्रेमचंद की रचनाओं के प्रति एक भावनात्मक दूरी पैदा हो गई है. उन्होंने कहा कि प्रेमचंद को जिस तरह स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है वो इसकी एक वजह हो सकती है . उन्होंने कहा कि इसकी वजह से लोग प्रेमचंद की रचनाओं से सहजता से वाकिफ़ नहीं हो पा रहे हैं. उन्होंने कहा कि इसका दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि प्रेमचंद की रचनाओं को लेकर एक तरह का कोरा आदर्शवाद व्याप्त हो गया है. आलोक राय ने कहा कि प्रेमचंद के समय का समाज इतना नहीं बदला है कि वे अप्रासंगिक हो जाएँ. उन्होंने कहा कि प्रासंगिकता के लिए ज़रुरी है कि औपचारिकताओं के बाद काम भी होना चाहिए. आलोक राय ने स्वीकार किया कि इस समय ऐसी कोई संस्था नहीं है जो प्रेमचंद पर काम कर रही हो. इस सवाल पर कि ऐसी सूरत में कौन काम करेगा, उन्होंने कहा, "प्रेमचंद सिर्फ़ मेरे नहीं हैं. उन पर काम करने के बारे में सार्वजनिक रुप से प्रयास होना चाहिए." यह पूछने पर कि काम क्यों नहीं होता, उन्होंने पलटकर पूछा, "किसमें माद्दा है इतना?" |
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