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मंगलवार, 10 मई, 2005 को 06:06 GMT तक के समाचार
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मंटो: आधी सदी का क़िस्सा

पत्नी सफिया के साथ मंटो
पत्नी सफिया के साथ मंटो
लाहौर के हम पाँच नौजवानों के लिए 1967 का साल दो कारणों से अहम था.

एक तो उस वर्ष सोवियत इंक़लाब की गोल्डन जुबली मनाई जा रही थी और दूसरी बड़ी घटना यह कि लाहौर में 'मंटो मेमोरियल सोसाइटी' की स्थापना हुई थी. यह सोसाइटी चूंकि हम दोस्तों की आम सहमति से बनी थी चुनांचे सेक्रेट्री, खज़ानची आदि के पद भी हमने आपस में बाँट लिए थे.

पैड छपवाने के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह सामने आया कि मंटो मेमोरियल सोसाइटी करेगी क्या? लिहाज़ा हमने एक औपचारिक पत्र तैयार किया और उस पर प्रसिद्ध साहित्यकारों और शायरों के दस्तख़त लेने शुरू कर दिए.

अहमद नदीम कासमी, सफदर मीर ने हमारी बहुत हौसलाआफ़ज़ाई की और हर तरह के सहयोग का यकीन दिलाया.

हमारी सोसाइटी का पहला मक़सद था मंटो की कब्र की खोज़. असल में हम वह क़तबा (ऐसी तख़्ती जिस पर जन्म और मृत्यु की तारीख़ और नाम होता है) पढ़ने के लिए बेचैन थे जिस पर दर्ज था, "मनों मिट्टी तले दबा मंटो अब भी सोच रहा है कि वह बड़ा अफ़साना निगार है या खुदा?"

मियानी साहब के कब्रिस्तान पहुंचकर हमने वहाँ के दफ्तर से संपर्क किया तो पता चला कि वहाँ कोई भी मंटो के नाम से परिचित नहीं है और उनके रजिस्टर में 1960 से पहले का कोई रिकार्ड नहीं है.

हमने मंटो के घर का रूख़ किया. दरवाज़े पर दस्तक दी तो दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, “मालूम नहीं कोई घास डालेगा या नहीं ”.

लेकिन सफिया मंटो जो कि बेहत सादा और भली मानस महिला थी बड़ी मोहब्बत से पेश आईं. हमने सफिया मंटो के नाम से जो एकाध लेख पढ़ रखा था उसकी रोशनी में ख़ातून को जाँचा तो मायूसी हुई क्योंकि हम तेज़ तर्रार इंटेलक्चुअल क़िस्म की औरत की कल्पना लिए हुए थे.

बातों-बातों में जब उनके लेखन का ज़िक्र आया तो उन्होंने साफ़-साफ़ बता दिया कि वह लेखिका नहीं थी और उन्होंने कभी कुछ नहीं लिखा. अलबत्ता ज़रूरत के तहत एक दो लेखों पर उनका नाम ज़रूर छापा गया था.

इत्र की जगह शराब

बेगम सफिया मंटो को हमने इस बात पर राज़ी कर लिया कि वह मंटो दिवस पर विशेष अतिथि के रूप में आएगी.

मंटो की कब्र
मंटो की कब्र लाहौर में ही है

ज्यों-ज्यों मंटो की जन्म तिथि करीब आ रही थी हमारा जोशोख़रोश बढ़ता जा रहा था.

हमने मंटो के सभी समकालीनों से मुलाकात कर मंटो पर लेख लिखवाए और माल रोड पर एक सरकारी ऑडिटोरियम भी जलसे के लिए बुक कर लिया.

मंटो दिवस का कार्यक्रम पाक टी हाऊस में बैठकर तैयार हुआ जिसके मुताबिक़ हमें सुबह सवेरे मंटो की कब्र पर जाना था. वहाँ फूल चढ़ाने और फातेहा पढ़ने के बाद वापस टी हाऊस आकर शाम के जलसे की तैयारी करनी थी.

चूंकि सोसाइटी के ज़्यादातर सदस्य सेकुलर विचारों के थे इसलिए कब्र पर अदा की जाने वाली रस्म का विरोध शुरू हो गया. विरोध की इंतिहा तो यह हो गई कि एक साहब ने यहाँ तक कह दिया कि इत्र गुलाब का छिड़काव बेकार है, उस पर ठर्रे का छिड़काव होना चाहिए.

और फिर उसने देसी शराब की बोतल देने की पेशकश भी की. शराब के सुझाव पर गंभीरता से विचार हो रहा था कि टी हाऊस में रोज़ाना आने वाले ज़ाहिद डार ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा, "यूँ शराब को बर्बाद होते देख उसकी रूह बेचैन हो जाएगी. बेहतर है वह बोतल किसी ज़रूरतमंद को दे दो."

ज़ाहिद डार जैसे ख़ामोश तबियत इंसान के मुंह से इतना लंबा वाक्य सुन कर मंटो मेमोरियल सोसाइटी के सदस्य चकित रह गए और उन्होंने कब्र पर शराब छिड़कने का इरादा छोड़ दिया.

कब्र की तलाश

आखिर 18 जनवारी 1968 का वह दिन भी आ पहुंचा जिसे हम सबकी जिंदगी में एक यादगार दिन बनना था मंटो के कुछ जानकारों ने यह सलाह दी कि कब्र ढूंढने के लिए किसी पक्के जानकार को साथ लिया जाए वरना दूसरी बार भी नाकामी होगी.

बहरहाल हम मंटो के एक ऐसे प्रशसंक का पता मालूम करने में कामयाब हो गए जो बिना नागा मंटो की कब्र पर जाया करता था.

 मंटो साहब बहुत मशहूर शायर थे जनाब, बड़ी मशहूर हस्ती थे... मेरे भतीजे को सरकारी कॉलेज में दाखिला नहीं मिल रहा था. बस मंटो साहब के एक इशारे पर मिल गया...बहुत बड़े शायर थे
एक नाई का बयान

हमें बताया गया कि वह व्यक्ति एक नाई है और कॉलेज के सामने उसकी दुकान है.

वहाँ पहुंचे तो हज्जाम के बजाए चाय का एक खोखा नज़र आया. वह व्यक्ति अपना पेशा बदल चुका था. बहरहाल बड़े प्रेम से मिला. कहने लगा, “मंटो साहब बहुत मशहूर शायर थे जनाब, बड़ी मशहूर हस्ती थे... मेरे भतीजे को सरकारी कॉलेज में दाखिला नहीं मिल रहा था. बस मंटो साहब के एक इशारे पर मिल गया...बहुत बड़े शायर थे.”

फिर उस हज्जाम उर्फ चाय वाले के बताए हुए पते पर हम रवाना हुए और सीधे मंटो की कब्र पर जाकर दम लिया. हमारा ख़्याल था कि 12 वर्ष में वह कब्र वीरान पड़ी होगी और झाड़-झंखाड़ के सिवा वहाँ कुछ नहीं मिलेगा. लेकिन हमने देखा कि कब्र की सफाई अभी-अभी की गई है और कोई प्रशंसक हमसे पहले आकर वहाँ ताज़ा-ताज़ा फूल चढ़ा गया है.

एक झटका अलबत्ता हमें ज़रूर लगा, कब्र पर लगे क़तबे की इबारत वह नहीं थी, जिसकी हम उम्मीद कर रहे थे. क़तबे की इबारत बदल गई थी. जिसमें ग़ालिब के शब्द इस्तेमाल करते हुए मंटो अपने उस विश्वास का इज़हार कर रहा था कि वह इस संसार रूपी तख़्ती पर लिखा हुआ शब्द नहीं है.

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