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कीर्ति चौधरी की तीन कविताएँ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बरसते हैं मेघ झर-झर
बरसते हैं मेघ झर-झर भीगती है धरा रंध्रों में समाती स्निग्ध रस की धार बरसते हैं मेघ झर-झर मुझे फिर से लुभाया खुले हुए आसमान के छोटे से टुकड़े ने,
दुख मेरा तब से कितना ही बड़ा हो वही चिड़ियों का गाना मेरे कातर भूले हुए मन के हित दुख मेरा भले ही कठिन हो मुझे कम नहीं दिया है वक़्त यह कैसा वक़्त है जैसे घृणा और प्यार के जो नियम हैं
ख़ूब खिले हुए फूल को देख कर यह कैसी लाचारी है इसके बिना जीवन कुछ इतना कठिन है जो भी हो संघर्षों की बात तो ठीक है फिर भी दुख-सुख से यह कैसी निस्संगिता | इससे जुड़ी ख़बरें नींद में सपना, सपने में घर15 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस 'साहित्य में अराजकता स्वाभाविक है और ज़रूरी भी'14 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस ताले और अक्षरों का तालमेल08 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस अरुण कमल की तीन कविताएँ14 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस त्रिलोचन की दो कविताएँ07 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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