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'साहित्य में अराजकता स्वाभाविक है और ज़रूरी भी' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विष्णु प्रभाकर हिंदी साहित्य के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं और इस समय के वरिष्ठतम साहित्यकार. ‘आवारा मसीहा’, ‘अर्ध नारीश्वर’ और ‘युगे-युगे क्रांति’ जैसी कालजयी कृतियों की रचना करने वाले विष्णु जी 95 वर्ष की आयु में आज भी निरंतर लिख रहे हैं. बिना थके सृजनकर्म में लगे इस रचनाकार से रत्ना कौशिक की लंबी बातचीत के कुछ अंश - कौन सी परिस्थितियाँ, प्रेरणा या दबाव थे जिनकी वजह से आपने लिखना शुरु किया? मेरी माँ परिवार की पहली पढ़ी लिखी महिला थी. वह दहेज में अपने साथ संदूक भर किताबें लाई थी. मैं माँ की किताबें पलटता हुआ ही बड़ा हुआ इसलिए किताबों के प्रति मेरा प्रेम स्वाभाविक था. दूसरी ओर पूरा बचपन माँ, दादी और परदादी से कहानियाँ सुनते हुए बीता. परदादी की सुनाई हुई एक कहानी ने मेरी ज़िंदगी ही बदल दी. कौन सी कहानी थी वह? इस कहानी में राजकुमार जब विदेश यात्रा पर निकलता तो उसे आदेश मिलता, बेटा, पूरब जाना, पच्छिम जाना, उत्तर जाना पर दक्खन न जाना. पर राजकुमार सदा दक्खन ही जाता. वह विकट मार्गों और आपदाओं को पार करता हुआ, भयानक पशुओं, देव-दानवों से लड़ता हुआ किसी अज्ञात स्थान पर, किसी दुर्गेय दुर्ग में, अचानक दानव की कैद से राजकुमारी को लेकर लौटता. 90 वर्ष पहले सुनी इस कहानी से मेरे बाल मन को खुशी से भर दिया. मना करने पर भी दक्खन जाने पर सफलता पाने की बात धीरे-धीरे जैसे मैं बड़ा होता गया, मेरे स्वभाव को प्रभावित करती चली गई. दक्खन दिशा यमराज की अधिकार दिशा है. मृत्यु के अधिकार क्षेत्र यानी संघर्षों से जूझकर ही राजकुमारी रूपी सफलता प्राप्त होती है. यह कहानी मेरे सृजन की प्रेरणा बनी और आज 95 वर्ष की आयु में भी बनी हुई है. साहित्य में इतने युग आए और गए पर आपने गाँधीवाद का साथ नहीं छोड़ा. आज के इस बाज़ारवाद के युग में गाँधीवाद की क्या प्रासंगिकता है? गाँधीवाद की प्रासंगिकता हर युग में रहेगी क्योंकि यह शाश्वत मूल्यों पर आधारित है और बुनियादी तत्वों की बात करता है. मूल्यहीनता के दौर में आपको सबसे ज़्यादा कौन सी चीज़ आहत करती है? बेईमानी और भ्रष्टाचार की सूची में भारत का नाम ऊपर देख मेरा मन बेचैन हो जाता है. सिर शर्म से झुक जाता है. आपकी रचनाओं में जो आदर्शवाद मिलता है, क्या आज की नई पीढ़ी इसे समझने-बूझने में सक्षम है? आज की नई पीढ़ी बहुत सक्षम है. मैं इसे लेकर आशवस्त हूँ. हर पीढ़ी अपने हिसाब से परिवर्तन करती है. क्राँति करती है, पर मनुष्यता के मूल्य कभी नहीं बदलते. कहानी प्रेमचंद से लेकर आज कहाँ पहुँच गई पर इससे प्रेमचंद का महत्व कम नहीं हुआ है. पर इस पीढ़ी में आपकी पीढ़ी जैसी साहित्यिक आस्था, निष्ठा और अनुशासन कहां दिखती है? हमें ये सब दिखाई देता है. जब तेज़ बारिश आती है तब परनालों के साथ गंदगी भी बहती है. अराजकता स्वाभाविक है और ज़रूरी भी. तभी कुछ लोग छँट कर सामने आते हैं. कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, नरेश मेहता, उषा-प्रियंवदा और ऐसे बहुत सारे लेखक इसका प्रमाण हैं. क्या शरतचंद्र के बाद किसी और ‘आवारा मसीहा’ ने आपको अपनी ओर आकर्षित नहीं किया? हिंदी में बहुत से लोग हैं, जिन पर लिखा जा सकता था. जैसे ‘निराला’. पर समय ही नहीं. 14 साल तो ‘आवारा मसीहा’ लिखने में चले गए. जब आप ‘आवारा मसीहा’ लिख रहे थे तो क्या आपको भास था कि आप एक कालजयी रचना लिखने जा रहे हैं? बम्बई की एक संस्था ‘हिंदी ग्रंथ रत्नाकर’ 55 भागों में समूचे शरत् साहित्य को हिंदी में छाप चुकी थी. अब वह उनकी 200 पेज की एक जीवनी छापना चाहती थी. तीन साल तक वे पीछे पड़े रहे और हम मना करते रहे. आखिर में हमने उनके बारे में पढ़ना शुरू किया और उनके बारे में जानकारी हासिल करने के लिए दर-दर भटकना भी. जहां जाता वहीं लोग कहते, ‘‘तुम उस गुंडे पर लिखना चाहते हो?’’ मेरी जिज्ञासा बढ़ती गई कि आखिर यह गुंडा था क्या? इसे जानना चुनौती बन गया और इस गुंडे का पता लगाने में मुझे 14 साल लग गए. उनका क़द और चरित्र ही ऐसा था. उससे बड़ा क्राँतिकारी मैंने आज तक नहीं देखा. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि मैनें यह किताब छह बार लिखी. दो बार तो फाड़ कर ही फेंक दी. हिंदी साहित्य के बुर्जुर्ग के रूप में आप आज के साहित्यिक माहौल को किस तरह देखते हैं? आज़ादी के बाद साहित्यिक जगत में जो तूफ़ान आया है, वह यह साबित करता है कि जीवन है, जागृति है. हम आगे बढ़ाना चाहते हैं. कुछ अराजकता है पर उसका कारण भ्रष्ट राजनीति है जिसका लेखन पर भी प्रभाव पड़ रहा है. आज की परिस्थितियों में क्या साहित्य जीविका का साधन बन सकता है? हां, दाल-रोटी खाई जा सकती है. आपके पदमभूषण लौटाने और राष्ट्रपति द्वारा आपके हिंदी में लिखे पत्रों का जवाब न देने पर आक्रोश पिछले दिनों चर्चा का विषय रहा? मैं इस पदमभूषण का क्या करूँ? मुझे इससे इस उम्र में क्या सहूलियत मिल सकती है? तो क्या आपकी राय में पुरस्कारों में आर्थिक पहलू को जोड़ा जाना चाहिए? रचनाकार को खरीदा नहीं जाना चाहिए. पर साहित्य पर जीना थोड़ा मुश्किल काम है. आर्थिक पक्ष से थोड़ी सहूलियत हो जाती है. क्या कभी ऐसा लगा कि बहुत लिखना-पढ़ना हो गया अब और नहीं? नहीं ऐसा कभी नहीं लगा. 95वर्ष की आयु में भी मैं नियमित रूप से लिखता हूँ. आज कल किस रचना पर काम कर रहे हैं? मैं अपनी आत्मकथा के संस्मरण का चौथा भाग लिख रहा हूँ. दो उपन्यास हैं और भी बहुत कुछ है पर पता नहीं अब कितना पूरा कर पाऊँगा. बहुत आयु हो गई. आपको अपनी सबसे अच्छी रचना कौन सी लगती है? ‘अवारा मसीहा के बाद’, ‘नर-नारी की समस्या’ से जूझता उपन्यास ‘अर्धनारीश्वर’. आप अपनी साहित्यिक यात्रा से संतुष्ट हैं? मैं पूरी तरह संतुष्ट हूँ. बस एक तकलीफ़ है. हमने इतना लिखा है पर हमारे साहित्य को एक उपन्यास ‘आवारा मसीहा’ और एक कहानी ‘धरती अब भी घूम रही है’ तक सीमित कर दिया गया है. मैं लोगों से कहता हूं भई कुछ और पढ़ो. चर्चा के लिए बहुत कुछ है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'सत्याग्रह' को हुए सौ साल पूरे11 सितंबर, 2006 | पत्रिका ऐसे खोजा महात्मा गांधी ने 'सत्याग्रह'11 सितंबर, 2006 | पत्रिका 'राजनीति के बिना गुज़ारा मुश्किल'08 सितंबर, 2006 | पत्रिका अब भी चमत्कृत करती है 'माँ'08 सितंबर, 2006 | पत्रिका एक कालजयी रचना के सौ साल08 सितंबर, 2006 | पत्रिका उपन्यास 'आकाश चम्पा' का अंश08 सितंबर, 2006 | पत्रिका कायांतरण08 सितंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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