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'राजनीति के बिना गुज़ारा मुश्किल'

आज जिस तरह का प्रजातंत्र है उसमें राजनीति मानों सर्वव्याप्त जैसी हो गई है और अब उससे बचना बहुत मुश्किल दिखता है.

पहले हमारा समाज सामाजिक समाज था लेकिन अब लगने लगा है कि यह राजनीतिक समाज हो गया है.

रेखांकन: डॉ लाल रत्नाकर

वैसे तो राजनीति का सीधा संबंध मनुष्यता से होता है लेकिन राजनीति की वजह से मानवीय संबंध बदल रहे हैं.

आपसी संबंध के कारणों में अगर जाएँ तो अब, गहरे संबंध, लंबे समय के सामाजिक संबंध नहीं रह गए. अब वे राजनीतिक समाज के संबंध हो गए हैं.

पहले जो सामाजिक समाज था उसमें अपने से बड़ों को काका या बड़ा या दादा या चाचा जैसे संबोधनों से संबोधित करते थे और उनके सामने वैसे ही होते थे जैसे किसी बड़े के सामने होते हैं.

लेकिन अब वह स्थिति नहीं है. अब तो सारी चीज़ों और स्थितियों को देखने के पीछे कहीं न कहीं से प्रत्यक्ष या परोक्ष राजनीतिक कारण होता है.

राजनीति तो घुसपैठ करती है.

अब हम अगर किसी हवा-बंद कमरे में भी अपने आपको क़ैद कर लें तो वहाँ राजनीति के प्रवेश को नहीं रोक सकते. राजनीति अब हर जगह इस तरह से उपस्थित है जिस तरह से साँस लेने में हवा उपस्थित होती है.

इसलिए अब राजनीति के बिना गुज़ारा मुश्किल है. लोग अगर अभी इसे महसूस नहीं कर रहे हैं तो जल्दी ही महसूस करने लगेंगे.

इस राजनीति से अगर बचना हो तो इसका सबसे अच्छा तरीक़ा है इससे जूझ जाना. जितना आप राजनीति से जूझेंगे उतना ही अपने आपको आप राजनीति से बचा पाएँगे.

अगर आप राजनीति से नहीं जूझेंगे तो अपने आपको निहत्था महसूस करेंगे.

 ऐसा लगता है कि राजनीति की वजह से लोग ज़रुरत से ज़्यादा संवेदनशील हो गए हैं. लेकिन यह संवेदनशीलता मानवीयता के लिए उतनी नहीं है जितनी राजनीति को लेकर है

जहाँ तक राजनीति और साहित्य के अंतरसंबंधों की बात है तो साहित्य अपनी मज़बूती, साहित्य होने के आवरण के साथ उपस्थित होता है. उस पर समसामायिक परिवर्तनों का असर कम ही होता है.

फिर भी ऐसी कोई राजनीति नहीं जो साहित्य को बढ़ावा दे. साहित्य की ओर राजनीति का ध्यान इसलिए नहीं जाता क्योंकि साहित्य कभी राजनीति के लिए ख़तरा नहीं रहा. जब तक साहित्य राजनीति के लिए ख़तरा नहीं बनता इसकी ओर उसका ध्यान जाएगा भी नहीं.

जिस दिन राजनीति का ध्यान साहित्य की ओर जाएगा, या तो उसे नष्ट करने के लिए जाएगा या फिर अपनी तरह से उसे सँवारने के लिए. और दोनों ही परिस्थितियों में यह मुश्किल काम होगा.

वैसे हम कहते हैं कि हम लिखने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन तब भी एक अंदरूनी ‘सेंसरशिप’ हमेशा लागू रहती है. समाज में लिखने के बाद के ऐसे कई कारण होते हैं, जिसकी वजह से आदमी कहीं न कहीं अपने आपको असुरक्षित महसूस करने लगा है.

ऐसा लगता है कि राजनीति की वजह से लोग ज़रुरत से ज़्यादा संवेदनशील हो गए हैं. लेकिन यह संवेदनशीलता मानवीयता के लिए उतनी नहीं है जितनी राजनीति को लेकर है.

हालांकि मनुष्य या मनुष्यता जितना बड़ा विषय है, उसकी तुलना में तो राजनीति बहुत छोटा विषय है. लेकिन मनुष्यता के लिए भी धीरे-धीरे राजनीति एक बड़ा विषय होती जा रही है.

मनुष्य के साथ जीवन जुड़ा है और जीवन के साथ जीवनयापन जैसी चीज़ जुड़ी होती है और इसमें बाज़ार एक कठिन सा रास्ता होता जा रहा है.

अब तो लगता है कि जैसे बिना बाज़ार से गुज़रे हुए आदमी घर नहीं पहुँच सकता. बाज़ार से गुज़रे बिना वह अपने परिवार को नहीं पा सकता.

परिवार में या पारिवारिक होने के लिए बाज़ार की उपस्थिति इतनी ज़्यादा हो गई है कि सारा कुछ बहुत मुश्किल हो गया है.

चीज़ें और यहाँ तक कि घर भी लगातार दुकानों में परिवर्तित होते जा रहे हैं. हम परिवार में हम मानवीय होने के बजाय दुकानदार या ख़रीददार की तरह होते जा रहे हैं.

अब तो पड़ोसी होने का अर्थ भी धीरे-धीरे बदलता जा रहा है. ऐसा लगता है कि अपने को और अपने घर को बचाने के लिए पड़ोस को बचाने की ज़्यादा ज़रुरत महसूस होने लगी है.

कई बार लगता है कि मैं थका-हारा हूँ. शायद एक उम्र ऐसी होती है जिसमें आपको लगने लगता है कि आप थके-हारे से हैं. और अब, जब मैं अपने घर लौटता हूँ तो अपने पड़ोस से होकर ही लौटता हूँ और जब बाहर निकलूंगा तो पड़ोस से होकर ही बाहर निकलूंगा.

इसके सिवा कोई गुज़ारा नहीं है.

अब तो पता नहीं किस तरह की वैश्विक क़िस्म की बातचीत होने लगी है जिसमें पड़ोस ग़ायब होता जा रहा है.

वास्तव में हम तब तक वैश्विक नहीं हो सकते जब तक हमारी नज़र नज़दीक को साफ़ नहीं देख पाएगी.

(विनोद वर्मा से बातचीत के आधार पर)

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