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उपन्यास 'आकाश चम्पा' का अंश | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगली शाम को मचान पर लिखते समय बुधुआ की बोली ने खलल डाली, ‘हमरा ऊपर विसवास नै छै?’ मोतीलाल के कान खड़े हो गए. किससे झगड़ रहा है बुधुआ? मामी से? ‘जब अपने पहरा पर बैठना था तो हमरा काहें ला बैठाई थीं?’ बात धीरे-धीरे समझ में आती है मोतीलाल के, कि अकेले बुधुआ ही पहरा नहीं देता था मामी भी पहरे पर रहती थीं. हद ही हो गई खातिरदारी की. धीरे-धीरे कुछ और परतें खुलीं फिर कुछ और परतें...वह कौन है जो परछाइयों की तरह पीछे लगा है. घाट से दलान और दलान से मचान तक? मामी! लेकिन भला क्यों? वियोग विदग्धा मामी. सारी उमर निकाल दी मामाजी के पीछे. मामा, जो जाति खारिज, गाँव खारिज होने के कुछ साल बाद तेलंगाना गए तो लौटे ही नहीं. बुधुआ को जैसे कुकुरमाछी लग गई है. छनक-पटक कर चला गया है. शाम के झुटपुटे में मकई के पौधों के झुरमुट में खड़े हैं मोतीलाल. ‘मामी’ चिहुँक जाती है मामी, ‘पाहुन’ ‘हाँ’ स्वर भारी है. कुछ दिन से एक जो बात पूछने का मन करता है.’ दो थकी हुई आँखों ने, दो थकी हुई आँखों में झाँका. मामी की आँखों में अभी भी ‘भादर माह’ की बदली है. अब यह बदली छलक आई मोतीलाल की आँखों में, ‘हमरा ऊपर एतना ममता काहे?’ थोड़ी सी मुस्कराहट, थोड़ी सी उदासी. नाक सिकोड़कर पूछ रही हैं मामी, ‘सारी उमर पार कर देने के बाद आज पूछने आए हो पाहुन? जो ढका है, ढका ही रहने दो.’ चौक गए हैं मोतीलाल. ‘कहीं मामी मुझसे प्यार तो नहीं करतीं?’ ‘उसे अब भी नहीं खोलोगी तो कब खोलोगी?’ सुन कर गुन रही हैं मामी.
आसमान में बादल भी हैं, रिमझिम भी. एक छोटी सी बदली ने ढक रखा है अस्तमान सूर्य को. बदली के किनारे रंजित और रोशन हैं. मकई के पत्तों पर ‘पट-पुट’ बज रही हैं बूंदें - दूर भी पास भी. सूरज निकलता आ रहा है बदली से जैसे प्रसव हो रहा है उसका. पूरब इंद्रधनुष खिल रहा है. पर यह मुहुर्त भर का मायाजाल है जो सूरज के डूबने के साथ-साथ तिरोहित हो जाएगा. बूनी थम रही है. ‘हमने कुछ पूछा मामी...?’ मोतीलाल दोबारा याद दिलाते हैं मामी को. ‘पूछ रहे हो?’ मामी की गोरी गर्दन तन गई है. अरे बाप, यह कैसी नज़र से ताक रही हैं मामी. ऐसा रंग कब छलकता है आँखों में. ‘पूछ रहे हो तो सुनो...लेकिन एक बात... इस छिन के बाद ये ई समझ लो कि न हमने कुछ कहा, न तुमने कुछ सुना... जैसे बिजुरी चमक कर बादर में समा जाती है ठीक वैसे ही, यह बात भी... समझे?’ ‘जी लेकिन पहले बोलिए तो’ मामी तनिक हँसती हैं, ‘इतने अधीर मत बनो पाहुना. तुम गौरा की माँग के सिंदूर हो. आँचल के अनमोल रतन. तुम्हारा नाम मोतीलाल नहीं, हीरालाल होता तो भी कम था. इतना अच्छा भी नैं होना चाहिए कि देखकर जी ललचाए. सो तुम्हें देखकर लालच लगती. चुरा लेने का मन करता. अब गौरा, मेरी जानो कि गोबर की गौरी! क्या जाने तुम्हारी कदर. तुम्हें रख नहीं पाई. मैं होती तो दिखा देती.’ मामी ने नाक को सिकोड़ कर हल्की सी वो जुंबिश दी कि मोतीलाल निहाल हो उठे. ‘तुम्हें चुरा लेने का मन करता. इसलिए बार-बार तुम्हारे पास जाती रही. बहाने गढ़ती रही पास आने की... लेकिन तुम ठहरे एक ही कठ करेज. मुड़कर ताका भी नहीं कभी.’ मामी को तिरछी चितवन में गहरा उपालंभ है. ‘अरे!’ चकित रह गए मोतीलाल. इस शुष्क, नीरस जीवन की कोख में ऐसा कोई वरदान भी अभी तक छुपा पड़ा है जो घेरे हुए था, मगर जिसे देख न पाए थे. आज मामी के इस रहस्योदघाटन से सारे तहखाने रौशन हो रहे हैं और इनके वैभव पर वे चकित हैं. नैतिकता की लक्ष्मण रेखा दरक रही है,‘और अगर ताक देता तो शायद हमसे--- या हम दोनों से ही वह पाप हो जाता.’ मामी ने एक गहरी सांस भरी, ‘चलो, अपनी गौरा के दरबार में दोख-पाप का भागी होने से तो बच गए हम.’ मामी तनिक ठमकी फिर बोलीं तो स्वर बदला हुआ था. ‘अब इस सूखती, सड़ती देह में क्या है. यह भी तो नहीं कह सकती कि अँकवार में भर कर चूम लो हमें, बाहों के घेरे में इतना कसो, इतना कि देह की सारी नसें तड़क उठें. तृप्त कर दो हमें कि जवानी से लेकर आज उमर के इस उतार पर आज तक की पियासी आत्मा की सारी पियास मिट जाए... न! इन सबसे बचा लिया बैजनाथ बाबा ने. तुम्हारी तुमरे अंदर रह गई हमारी हमारे अंदर.’ दोनों दो मेघ खंडों की तरह पास आए, फिर ठिठक गई मामी. ‘ना ना छूना मत. मत छूना मुझे.’
ठमक गए मोतीलाल के बढ़ते कदम. अच्छा हुआ, दोनों ने एक दूसरे को छुआ नहीं. छू देते तो जाने कहां प्रलय आ जाता. दोनों में ही बिजलियाँ भरी थीं. ‘क्या तुम्हें मालूम है कि मामाजी कहाँ हैं? मोतीलाल ने नज़र झुका ली थी. हाँ मामी की सजल आँखे झुकी नहीं थीं. ‘क्या यह भी जानती हो कि...’ हाँ, वे अब कभी भी लौट कर नहीं आएंगे. वर्षों पहले ही तेलंगाना में पुलिस की गोली से...’ आधे वाक्य पर मामी ने उस मर्मभेदी हाहाकार को रोक लिया. ‘तो क्या वे रस से भरी सारी कहानियाँ, वह अभिसार, वह योगी...’ ‘सब मनगढंत थे लेकिन वही मेरे संबल थे. क्या करती?’ मामी किसी ढीठ की तरह बोले जा रही थीं. उनकी श्वेत लटें जैसे हर भुट्टे की भुई में फैल गई हों. मामी बोल रही थीं और शाम की द्वाभा में पके केशों के बीच उनकी माँग की लाली दमक रही थी. जैसे गंगा के इस दीरा (दीयर) के राशि-राशि भूले शुभ्र काँसों के बीच डूबने के पहले सूरज ठिठक गया हो. जैसे देह का सारा रक्त संकेद्रित हो गया हो उस सिंदूर में -आख़िरी बार भभककर जल जाने से पहले का उपक्रम! |
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