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सोमवार, 11 सितंबर, 2006 को 05:12 GMT तक के समाचार
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'सत्याग्रह' को हुए सौ साल पूरे

महात्मा गाँधी
ग्यारह सितंबर 1906. जगह थी दक्षिण अफ़्रीका के जोहान्सबर्ग का एम्पायर थिएटर.

वहाँ हज़ारों भारतीय इकट्ठा थे और अपने अधिकारों के लिए लड़ाई की शुरुआत कर रहे थे.

इस सभा में मोहनदास करमचंद गाँधी ने एक नया नाम दिया - सत्याग्रह.

दरअसल दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों को मज़दूर बनाकर ले जाया गया था. हज़ारों भारतीय थे. आठ हज़ार से अधिक.

वहाँ काबिज सरकार ने एक क़ानून बनाकर कहा कि भारतीयों को दक्षिण अफ़्रीका में रहने के लिए अपने आपको पंजीकृत करवाना होगा. इस पंजीकरण की शर्तें अजीब थी हीं और इसके लिए शुल्क भी भारी भरकम था.

इसका विरोध करने के लिए भारतीय समुदाय के नेताओं ने एम्पायर थिएटर में वह बैठक बुलवाई थी.

वह एक तरह से मज़दूरी करने गए भारतीयों यानी 'गिरमिटिया' पर क़ानूनी अत्याचारों की शुरुआत थी तो भारतीयों की ओर से अपने अधिकारों की लड़ाई की भी.

इसके बाद एक के बाद एक क़ानून आते रहे और भारतीय इसका विरोध करते रहे. कभी सालाना शुल्क लगाया गया तो कभी सरकार ने हिंदू विवाह पद्धति को ख़त्म किया.

लेकिन इसका विरोध चलता रहा और 14 बरसों के आंदोलन के बाद आख़िर 30 जून 1914 को सरकार और भारतीय समुदाय के बीच समझौता हुआ.

ज़ाहिर है कि गाँधी इस आंदोलन के अग्रणी नेता बन चुके थे. इन चौदह सालों में गाँधी को तीन बार जेल जाना पड़ा. दो बार दो-दो महीनों के लिए और एक बार तीन महीनों के लिए.

इन चौदह वर्षों के अनुभव ने गाँधी को तपाया और निखारा और उनके भीतर एक ऐसी आग भर दी जो भारत आकर पूरे परिदृष्य पर छा गई.

उन्होंने अपने सत्याग्रह को आख़िरकार 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो' का नाम दिया और 1947 को जो कुछ भारतीयों को हासिल हुआ उसमें इसका अहम योगदान था.

सत्य के प्रति आग्रह

गुजरात के एक आंदोलनकारी युवक ने एक ऐसा नारा दे दिया था जो इतिहास रचने जा रहा था. उन भारतीयों के लिए भी जो दक्षिण अफ़्रीका में अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे. और उन भारतीयों के लिए भी जो भारत में दक्षिण अफ़्रीका की तरह की औपनिवेशिकता को झेल रहे थे.

संपूर्ण रुप से अहिंसक आंदोलन के लिए दिया गया वह नारा एक ऐसा नारा था जिसने 'मोहनदास करमचंद गाँधी' को 'महात्मा गाँधी' बना दिया.

 विरोधी का बुरा चाहना और उसे दुखाने के इरादे से उनके प्रति कठोर वचन निकालने से सत्याग्रह का उल्लंघन होता है
महात्मा गाँधी

वह गाँधी की ओर से दुनिया को दी गई आंदोलन की एक नई परिभाषा थी.

इस सत्याग्रह को बाद में गाँधी ने परिभाषित करने हुए कहा था, "सत्याग्रह में प्रत्यक्ष या परोक्ष, मन, वचन और कर्म से किसी भी प्रकार की हिंसा का समावेश नहीं है."

वे एक पूरे साम्राज्य के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे थे लेकिन उन्होंने कहा, "विरोधी का बुरा चाहना और उसे दुखाने के इरादे से उनके प्रति कठोर वचन निकालने से सत्याग्रह का उल्लंघन होता है."

उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि सत्याग्रह किसी द्वेष या क्रोध का परिणाम नहीं होना चाहिए.

यह विरोध की एक नई अवधारणा थी कि किसी से लड़ों भी तो उसमें क्रोध और द्वेष नहीं होना चाहिए और अपने 'दुश्मन' का दिल भी नहीं दुखाना चाहिए.

महात्मा गाँधी की पौत्री इला गाँधी कहती हैं, "गाँधी के सत्याग्रह में सभी धर्मों का सम्मान करना भी शामिल था."

प्रासंगिकता

आज जब इस सत्याग्रह को सौ साल पूरे हो रहे हैं और दुनिया भर में चरमपंथ अपने शिखर पर दिखाई दे रहा है, पूरी दुनिया में एक अनकही बहस चल ही रही है कि 'सत्याग्रह' कितना प्रासंगिक है.

यह संयोग भर है कि दुनिया को 'आतंक' के भयावह तांडव से एक नया मोड़ देने वाली अमरीका की घटना की तारीख़ भी 11 सितंबर ही है.

भारतीय संसद

लेकिन इस हमले ने दुश्मनों से लड़ने की एक नई परिभाषा दी है जो 'सर्वशक्तिमान अमरीका' ने दी है, उसके राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने दी है.

'या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे ख़िलाफ़' कहकर 'आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई' की शुरुआत होती है और इसमें धैर्य को कोई स्थान नहीं दिया जाता.

दो सैनिकों के अपहरण के जवाब में इसराइल अपनी पूरी ताक़त झोंक देता है और लेबनान का बड़ा हिस्सा तबाह कर देता है. उधर लेबनान का गुट हिज़्बुल्ला भी गोलाबारी में कोई क़सर नहीं छोड़ता.

पूरी दुनिया एक 'आतंकवाद' नाम की चुनौती का सामना कर रही है तब गाँधी के सत्याग्रह और शांतिपूर्ण विरोध की अवधारणा की प्रासंगिकता पर विचार करना ग़लत भी नहीं लगता.

जब भारत अपनी आज़ादी के छह दशकों बाद भी सांप्रदायिकता और अलगाववाद की आग में जल रहा है तब गाँधी को याद करना स्वाभाविक भी है.

लेकिन जब पूरा भारतीय समाज अपने सांसदों को संसद के भीतर गाली-गलौज करते देखता है तो एक सवाल उसके मन में स्वाभाविक रुप से उठता ज़रुर होगा कि क्या यह वही सहिष्णु समाज है जिसकी कल्पना गाँधी ने की थी?

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