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क्यों ग़लत लग रही है गाँधी की सीख | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मौजूदा समय में जिससे भी पूछो कि महात्मा गाँधी की कितनी आवश्यकता है तो जवाब मिलता है कि गाँधी की आज भी उतनी ही ज़रूरत है जितने उनके दौर में थी. यदि ऐसा है तो फिर क्या वजह है कि गाँधी के विचारों और इन विचारों पर आधारित संस्थाओं का पतन हो रहा है? बाक़ी जगह तो दूर रही, यह चीज़ गुजरात में भी बहुत हद तक देखने में आ रही है. वो गुजरात जिसे गाँधी का गुजरात कहा जाता है, क्योंकि गाँधी यहीं से थे, चाहे वो हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों की बात हो, चाहे दलित उत्थान का मामला हो, गाँधी के समाजवाद का मसाला हो या फिर शराब-बंदी हो,हर जगह ठीक गाँधी की सीख के विपरीत हो रहा है. आखिर ऐसा क्यों हुआ? इस सवाल के जवाब बहुत से हैं. पड़ताल बुजुर्ग गाँधावादी चुन्नीभाई वैद्य तो मानते हैं लोगों ने सिर्फ गाँधी के नाम को जिंदा रखा और उनके मूल्यों से मुँह फेर लिया. वे कहते हैं,"हमको सरकार ने अनुदान दिया तो हमारा चरित्र अनुदान के साथ बंट गया. हम लोग खादी तो बनाते और बेचते रहे और जो गाँधी का एक किरदार था, सामाजिक क्रांतिकारी का, एक सीख थी कि समाज में क्रांति चलती रहनी चाहिए, उसे हम भूल गए." चुन्नीभाई कहते हैं,"सन 2002 के दंगों के बाद तो बहुत लोग बड़े फ़ख़्र से कहते हैं कि अब वो गाँधी के फ़लसफ़े से बाहर आ गए हैं और कायर नहीं रहे, गाँधी का अर्थ ग़लत समझते हैं." उनके शब्दों में,"दुर्भाग्यवश यह माना जा रहा है कि क्रांति का मतलब हिंसा है किसी को मार देना क्रांति है. क्रांति का सही मतलब तो मूल्यों का परिवर्तन होता है." गाँधीवाद के अध्ययनकर्ता रिज़वान क़ादरी इस विचार के हैं कि गाँधी के, जोश, उनके जैसे और उनके मक़सद को भूलाया जा चुका है. वे मानते हैं कि गाँधी की शहादत के बाद गाँधी की विचारधारा और उसमें मनाने वालों का अंत होता गया. पीढ़ियों का अंतर रिज़वान क़ादरी मानते हैं कि एक पीढ़ी खत्म होती गई और नई पीढ़ी अपने ही माहौल में खोई रही. क़ादरी कहते हैं,"उन्होंने उस जंग को नहीं देखा था, उस गुलामी को नहीं देखा था. तो आने वाली तीसरी पीढ़ी को पता नहीं था कि गाँधीवाद क्या था, वो मर मिटने और सरफरोशी की तमन्ना क्या थी. इसलिए धीरे-धीरे उस संस्था का ख़ात्मा होने लगा." क्या नवयुवकों के हाथ में गाँधीवादी संस्थाओं का नेतृत्व सौंपने से कुछ फर्क पड़ेगा? भाजपा नेता जयंती बरोट कुछ ऐसा ही मानते हैं. उनका कहना है,"गाँधी की सोच वाली संस्थाएं नए खून नई नए नौजवानों को साथ लेकर नहीं चलते हैं. मेरे दादा की उम्र के लोग ये संस्थाएं चला रहे हैं, इसलिए संस्थाएं उनकी उमर के साथ घिसती जा रही हैं." घर की मुर्गी बरोट कहते हैं कि अगर इन इरादों में युवा पीढ़ी को जोड़ा जाए तो बहुत बदलाव देखने में मिलेगा. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि चूँकि गाँधी गुजरात और भारत से थे, इसलिए उनकी अहमियत का अंदाज़ा आम आदमी को नहीं है. अहमदाबाद के कलाकार अरविंद पटेल कुछ ऐसा ही मानते हैं. पटेल का कहना है,"कई बार हम अपनी अच्छी चीज़ को पहचान नहीं पाते.वो कहावत है कि घर की मुर्गी दाल बराबर. इसलिए बहुत बार हम अनजाने में अपनी अच्छी चीज़ को अनदेखा कर जाते हैं." इन तमाम विचारों के बावजूद लोग यह मानते हैं कि कुछ समय बाद ही सही पर एक बार फिर ऐसा वक़्त आएगा जब संसार एक बार फिर गाँधी की ओर समस्याओं के समाधान के लिए देखेगा. |
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