उसके घर का स्नैपशॉट गली के उस कोने में छोटे-छोटे सपनों के ढेर पर कभी रोता, कभी हँसता छोटा सा घर था उसका अब वहाँ धुआँ है. चौके में चूल्हा है मगर अब ठंडा है चूल्हे पर हाँडी है, आधी ही पकी है सिलबट्टे पर लाल मिर्च की चटनी पिसते-पिसते ही रह गयी बाक़ी सब धुआँ है. पिछवाड़े मुर्ग़ियों का दड़बा है ख़ाली और सुनसान है कुछ टूटे हुए पंख हैं कुछ लाल-लाल धब्बे हैं बाक़ी सब धुआँ है. यह नजमा का फ़्रॉक है यह सलीम का बस्ता है यह अब्दुल की किताब है यह नसीम की शलवार है... यह नुची हुई पतंग का चिथड़ा है अब तक थर्रा रहा है. बाक़ी सब धुआँ है सिर्फ़ धुआँ. ******************** एक प्रवासी भारतीय की घर वापसी, छुट्टियों पर नुक्कड़ पर जो नीम का पेड़ था वह अब नहीं है यह होना था. पेड़ की जगह लंबी सी इमारत उग आई है हर पेड़ को मुँह चिढ़ाती यह होना था! सामने घरों के पिछवाड़े, जहाँ आँगन खुलते थे एक मैदान था, वहाँ सब्ज़ी वाले फेरी लगाते बारातें आतीं शामियाने लगते पुराने बर्तनों में क़लई होती बच्चे खेलने की उम्र में खेला करते वहाँ अब, अमरीका सा उग आया है हर आँगन सरक कर आगे बढ़ आया है आक्रामक और उद्दण्ड! यह भी होना था! पर जहाँ नीम का पेड़ था (जो अब नहीं है ) एक छाँह का दायरा था जिसे अब इमारत ने निगल लिया, ठीक वहीं – दुपहरियों में पकता हुआ बारिशों में गलता हुआ उम्र के तले में कीलें ठोंकता हुआ जहाँ प्रतिष्ठित था वह, उससे कुछ दूर एक टूटी हुई छतरी के नीचे बैठा आज भी फटी हुई चप्पल सिल रहा है. इस चप्पल पर मासूम गेंदों के निशान हैं, दर-दर भटक कर चालाक हो चुके पैरों की न मिटने वाली छाप है, किसी ठोकर से निकले बूँद भर ख़ून के सूखे हुए दाग़ हैं, देख देख कर छिल चुके सपनों के नए पुराने पैबंद हैं. वह आज भी चप्पल सिल रहा है सिर झुकाए तल्लीन, रोज़ रोज़ उगती हुई इमारतों में उपग्रहों से होकर आने वाली टूटती हुई दुनिया की ख़बरों से बेख़बर – वह मेरे मुहल्ले की पहचान सिल रहा है. (बीबीसी हिंदी सेवा प्रमुख अचला शर्मा एक जानीमानी कवियित्री और लेखिका हैं. उनके कई कहानी संग्रह और कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं. सूरीनाम के हिंदी सम्मेलन और पद्मानंद साहित्य पुरस्कार से सम्मानित अचला के रेडियो नाटकों के दो संग्रह 'पासपोर्ट' और 'जड़ें' प्रकाशित हो चुके हैं.) |