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यश मालवीय के नवगीत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
घर में ही घर चुप रहते हैं नींव के पत्थर चुप रहते हैं खिड़की दरवाज़े दीवारें डोला करती हैं छायाएँ अबाबील सी हर सच्चाई ख़ुद हैरत में हैं तकरीरें रेतघड़ी सुनसान सजाए खाते हैं धोखे पर धोखा सड़क पहाड़ों की ज्यों टूटे ये कैसा मौसम आया पानी का खारापन चखते लहरों की सीना ज़ोरी पर पर्वत सागर नदियों झीलों सबसे जीते ख़ुद से हारे जलती बुझती हैं कंदीलें मन कुछ कहता नहीं कि मन में ******************** पानी भी धुआँ देने लगा प्यास के हर प्रश्न पर सूखा कुआँ देने लगा
मरे पशु की गंध से भारी हुए रस्ते रो रहे हैं लोग, केवल हादसे हँसते जो मिला बस थके काँधों पर जुआ देने लगा युग पुरूष, युगबोध के और हुए दीखे बस जंयती, पुण्यतिथियों में उमर बीती ‘लोनमेला’ देख सब मेले हुए फीके हो रहा जो, कभी उसकी भी वजह देखो ********************************************** | इससे जुड़ी ख़बरें असद ज़ैदी की तीन कविताएँ06 अक्तूबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस जया जादवानी की दो कविताएँ28 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस कीर्ति चौधरी की तीन कविताएँ22 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस अरुण कमल की तीन कविताएँ14 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस त्रिलोचन की दो कविताएँ07 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस सम्बलपुर एक्सप्रेस28 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस नींद में सपना, सपने में घर15 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस कायांतरण08 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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