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कुँअर बेचैन के कुछ दोहे | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दोहे पानी ने मानी नहीं, कभी द्वैत की बात * बोलो फिर कैसे कटे, यह जीवन की रात * स्वस्थ समर्थन है कठिन, खंडन है आसान * राजनीति बंदूक है, कविता एक सितार * सात गगन, ये सात स्वर, सप्त वचन, नवरंग * प्रतिभा का लक्षण यही, पद चाहे ना मोल. * राजनीति ये खेलती, कैसे-कैसे खेल * सर पर जलती आग है, पैरों में भी आग * निंदा का काला धुआँ अंधर देय बनाय * जहाँ त्याग का त्याग है, वहाँ लोभ ही लोभ * * जहाँ काम है, लोभ है, और मोह की मार * प्रेम और प्रिय प्रार्थना, एक भाव दो रूप. * तन का सुख ज्यों धूप में, इक छतरी की छाँव * योग और शुभ ध्यान के, लेकर ये दो पाँव. * वर्तमान तो ब्रह्म है, आगत माया-रूप. * पथ के पत्थर से ‘कुँअर’, यह ही एक बचाव. ****************************************** | इससे जुड़ी ख़बरें असद ज़ैदी की तीन कविताएँ06 अक्तूबर, 2006 | पत्रिका जया जादवानी की दो कविताएँ28 सितंबर, 2006 | पत्रिका कीर्ति चौधरी की तीन कविताएँ22 सितंबर, 2006 | पत्रिका अरुण कमल की तीन कविताएँ14 सितंबर, 2006 | पत्रिका त्रिलोचन की दो कविताएँ07 सितंबर, 2006 | पत्रिका सम्बलपुर एक्सप्रेस28 सितंबर, 2006 | पत्रिका नींद में सपना, सपने में घर15 सितंबर, 2006 | पत्रिका कायांतरण08 सितंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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