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'ऋतिक, अमिताभ जी के साथ काम करना चाहती हूँ' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
टीवी पर या फ़िल्मों में, सिनेमाघर के पर्दे पर आपने मुझे देखा ही होगा पर आज मैं बीबीसी के ज़रिए आप लोगों से बातचीत करना चाहती हूँ. दो फ़िल्में ‘वास्तुशास्त्र’ और ‘कभी अलविदा न कहना’ के अलावा सनफीस्ट बिस्किट, मैगी, नोकिया, बिग बाज़ार, मूव, कॉफी कैफे डे जैसे विज्ञापन मैंने किए हैं लेकिन सबसे पहला विज्ञापन जो मैंने 3 साल की उम्र में किया था. इस विज्ञापन के लिए मुझे पूरा गंजा होना था. उस अनुभव को मैं कभी नहीं भूल सकती हूँ. इसके बाद मुझे ख़ुद एक्टिंग में मज़ा आने लगा. मैंने कभी कोई एक्टिंग कोर्स नहीं किया. कभी-कभी ख़ुद ही घर पर डायलॉग बोलती थी. मम्मी को लगा कि मैं एक्टिंग अच्छा कर सकती हूँ और फिर उन्होंने इसके लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं. जब मैं चार साल की थी तो मम्मी ने मेरा फ़ोटो सेशन करवाया था. सौरभ नारंग अंकल को अपनी फ़िल्म ‘वास्तुशास्त्र’ के लिए कोई लड़का चाहिए था. मम्मी की और उनकी एक कॉमन दोस्त ने मेरे बारे में उन्हें बताया और मेरे ऑडिशन के बाद मुझे फ़िल्म में ले लिया गया. सेट पर कभी-कभी जब मुझे सीन समझने में परेशानी होती है तो निर्देशक या मेरी मम्मी मुझे शॉट करके बताती हैं और फिर मैं उसे करती हूँ. निर्देशक जब ज़ोर से बोलता है कि रोना है तो मैं रोने लगती हूँ. गुस्सा करने को बोलते हैं तो मैं गुस्से से अपना मुंह लाल कर लेती हूँ, फिर सब बोलते हैं गुड शॉट तो मुझे बहुत अच्छा लगता है. जब कभी कोई सीन एकदम कठिन होता है तो मम्मी मेरी बहुत मदद करती हैं. मेरे पसंदीदा निर्देशक करण जौहर और सौरभ नारंग हैं. सेट पर ये मेरी ख़ूब मदद करते हैं और मुझे बहुत प्यार भी करते हैं. मुझे अपने शॉट्स तैयार करने में ज़्यादा समय नहीं लगते हैं. किसी भी सामान्य शॉट को तैयार करने के लिए मुझे 2 सेकण्ड और कुछ कठिन सीन के लिए 2 सिनट लगते हैं. जब मुझे कोई कठिन सीन करना होता है और मुझे लगता है कि यह मैं कैसे कर पाऊँगी, उस वक्त मैं सोचती हूँ कि जब शाहरूख़ या सुष्मिता यह सीन कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं? बस, फिर क्या, मेरे अंदर काम करने की क्षमता और बढ़ जाती है. फ़िल्म ‘वास्तुशास्त्र’ की शूटिंग के समय एक सीन में मुझे पेड़ पर चढ़ना था. सौरभ अंकल ने मुझसे पूछा कि बेटा तुम पेड़ पर चढ़ लोगी? मैंने कहा- हां, थोड़ा-थोड़ा. लेकिन मुझे अंदर से डर भी लग रहा था फिर भी मैंने कोशिश की और सब लोगों ने कहा कि अहसास ‘यू कैन डू इट....’ फिर सुश्मिता सेन को देखा तो लगा कि मैं भी इनकी तरह ही चढ़ सकती हूँ. पढ़ाई की चिंता अपनी पढ़ाई को लेकर मुझे कभी-कभी थोड़ी फ़िक्र होती है लेकिन इसका भी मेरी मम्मी पूरा ख़याल रखती हैं. मेरी मम्मी मेरा पूरा बैग सेट पर ही लेकर जाती हैं और शॉट ख़त्म होने के बाद मुझे पढ़ाई करने के लिए कहती हैं. मैं अपना होमवर्क भी सेट पर ही करती हूँ. मेकअप रूम में भी मम्मी मुझे पढ़ाई करने के लिए बोलती हैं.
जब कभी मैं मम्मी की बात नहीं मानती हूँ तो वो मुझे डाँटती भी हैं और फिर थोड़ी ही देर में मुझे प्यार से गले लगाकर समझाती हैं कि वो मुझे एकदम बेस्ट बनाना चाहती हैं, इसलिए मुझे डाँटती हैं. सार्वजनिक स्थान पर लोग मुझे पहचानते हैं और कई लोग मुझे यह भी बताने लगते हैं और क्या करना चाहिए था, क्या कमी रह गई थी या क्या मैंने बहुत अच्छा किया. मेरे दोस्त मुझे कहते हैं कि मैंने ‘कभी अलविदा न कहना’ में इतना भोंदू रोल क्यों किया, कोई कहता है तुम्हें फ़ुटबॉल उठाकर उसे देने की क्या ज़रूरत थी...वगैरह वगैरह...लोग आते-जाते सवाल जड़ देते हैं लेकिन ये सब देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता है कि लोग मेरे काम पर ध्यान देते हैं. शाहरूख़, प्रीटी ज़िंटा, सुश्मिता, रानी जैसे बड़े कलाकारों के साथ काम करके मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है. मैं भी इन्हें देखकर अपने अभिनय को और निखारती हूँ. शाहरूख़ अंकल की तरह मैं भी अच्छे शॉट देना चाहती हूँ. आगे का सफ़र बड़ी होकर मैं अभिनेत्री ही बनना चाहती हूँ. मेरी सबसे पसंदीदा अभिनेत्री प्रीटी ज़िंटा हैं क्योंकि वो सेट पर सबसे हैलो बोलती हैं और बहुत अच्छी हैं. वो पूरी तरह से अपनी ज़िंदगी को जीना जानती हैं. मेरे पसंदीदा अभिनेता शाहरूख़ ख़ान हैं. जब मैं ‘कभी अलविदा न कहना’ की शूटिंग के लिए विदेश गई थी तो वहाँ पर बहुत ठंड थी. जब मुझे ठंडी लगती तो शाहरूख़ अंकल बोलते कि अपने दोनों हाथ को रगड़ो और ज़ोर ज़ोर से भागो, ठंडी दो मिनट में ग़ायब हो जाएगी. हाल ही में मेरी एक फ़िल्म ‘तरकश’ पूरी हुई है. इसमें मुझे पानी में जाना था, धनुष चलाना था. कई नई-नई चीज़ें भी मुझे सीखने को मिली. मैं ऋतिक रोशन और अमिताभ बच्चन के साथ काम करना चाहती हूँ. जब मैंने सुस्मिता सेन के साथ काम किया था तो मुझे शाहरूख़ के साथ काम करने की भी इच्छा जागी थी. शाहरुख़ के साथ तो काम कर लिया. शायद मेरी यह तमन्ना भी जल्द ही पूरी हो. कई लोग कहते हैं कि मैं लड़की हूँ तो लड़कों का किरदार क्यों करती हूँ. मैं मानती हूँ कि मैं एक कलाकार हूँ और एक्टिंग करना ही मेरा काम है. अगर मुझे लड़कों के ही अच्छे किरदार मिलेंगे तो मैं क्यों नहीं करूँगी. मुझे फिलहाल इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है, मैं सिर्फ़ अपना काम करती हूँ. (वेदिका त्रिपाठी से बातचीत पर आधारित) | इससे जुड़ी ख़बरें 'बेटी के लिए बाबुल ने गाया ख़ास गीत'04 दिसंबर, 2006 | पत्रिका ऋतिक रोशन के सोलह श्रृंगार11 अगस्त, 2006 | पत्रिका मुंबई में बाल नाट्य महोत्सव की धूम14 मई, 2006 | पत्रिका पढ़ाई करने का बल्ले-बल्ले आइडिया29 मार्च, 2006 | पत्रिका बच्चों के लिए आया नया चैनल17 दिसंबर, 2004 | पत्रिका 'बाल फ़िल्मों के लिए अनुकूल माहौल नहीं'21 फ़रवरी, 2004 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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