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मंगलवार, 07 दिसंबर, 2004 को 12:46 GMT तक के समाचार
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गुजरात के बच्चे अभी भी परेशानी में

बच्चे
लड़कियों की शिक्षा की समस्या तो और भी बड़ी है
गुजरात दंगों के लगभग तीन बरस बाद जहाँ लोग जीवन को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, वही दंगों के शिकार बच्चे ख़ास किस्म की परेशानियों का सामना कर रहे हैं.

यह परेशानी है उनकी मानसिक स्थिति और शिक्षा को लेकर.

आर्थिक बदहाली के चलते बहुत से बच्चों को पढ़ाई से साथ मज़दूरी भी करनी पड़ रही है, जिसकी वज़ह से वो पढ़ाई की ओर कम ध्यान दे पा रहे हैं.

दूसरी ओर दंगों के बाद से बच्चों को जो मानसिक त्रासदी का सामना करना पड़ा उससे उबारने के लिए भी प्रयास नहीं किए गए.

मज़दूरी की मजबूरी

एक ऐसा बालक रमीज़ राजा कहता है-"मैं सिर्फ पढ़ना चाहता हूँ, पर घर के हालात ऐसे नहीं हैं मुझे लारी ले कर निकलता पड़ता है और आलू, प्याज बेचना पड़ता है. पढ़ाई के लिए बहुत कम समय मिलता है. मेरी इच्छा वैज्ञानिक बनने की है लेकिन इतने पैसे नहीं हैं मेरे अब्बा के पास."

 मैं सिर्फ पढ़ना चाहता हूँ, पर घर के हालात ऐसे नहीं हैं मुझे लारी ले कर निकलता पड़ता है और आलू, प्याज बेचना पड़ता है. पढ़ाई के लिए बहुत कम समय मिलता है. मेरी इच्छा वैज्ञानिक बनने की है लेकिन इतने पैसे नहीं हैं मेरे अब्बा के पास
रमीज़ राजा

भावनगर में कार्यरत समाजिक कार्यकर्ता पारूल कहती हैं, "बच्चों के मन में एक दूसरे के लिए भेदभाव नहीं है. हमको यह लगता है कि यह उन पर बड़ों द्वारा लादा जाता है. हमें इन बच्चों को खेल-खेल में एक दूसरे के पास लाना चाहिए. आज हमें यकीन है कि सिकंदर और दीपक नहीं लड़ने वाले."

पर वो साथ ये कहती हैं, "दंगों के बाद बच्चों को काम पर जाना पड़ा जिसकी वजह से बाल मज़दूरी बढ़ी और उनकी शिक्षा पर फ़र्क पड़ा. आज इस ओर हम काम कर रहे हैं."

पारूल की बात के आगे बढ़ाते हुए अहमदाबाद में काम कर रही मीरा रफी कहती हैं, "दंगों के तुरंत बाद लोगों ने बच्चों की शिक्षा के लिए पैसे दिए पर यह पैसा सिर्फ कुछ समय के लिए पर्याप्त था."

वे बताती हैं कि एक साल बाद फिर पैसे की कमी पड़ी. इस वजह से आज बच्चों की शिक्षा को जारी रखने में काफ़ी परेशानी है.

वे कहती हैं, "हम लोग तरह-तरह से कोशिश कर रहे हैं स्कूल से निकाले गए बच्चों तो किसी तरह वापिस भेज सकें."

दंगों के बाद बहुत से बच्चों को सामाजिक संस्थाओं ने हैदराबाद और महाराष्ट्र में रिहायशी स्कूलों में भेज दिया था.

पर सब बच्चे उनकी तरह ख़ुशकिस्मत नहीं थे. जो पीछे रह गए उनके लिए शिक्षा का इंतज़ाम करना एक बड़ी चुनौती बन गया है.

सिटिजंस रिलीफ़ सर्विस के शरीफ खान पठान कहते हैं, "दंगों के बाद हमने बहुत से परिवारों को एक साल की फ़ीस दी थी, साथ ही जो नए रिहायशी इलाक़े बसाए गए, जहाँ पर दंगों के शिकार लोगों के पुनर्वास का इंतज़ाम किया गया. वहीं हमने छोटे-छोटे कुछ कमरे शिक्षा के लिए दिए. इसके लिए और स्कूल बनाने की ज़रूरत है."

मानसिक त्रासदी

दंगों को देख लेने के बाद बच्चे आज तक अपने को असुरक्षित महसूस करते है.

 सतह पर सब ठीक लगता है लेकिन बच्चों के भीतर का भय अभी हम ख़त्म नहीं कर पाएँ हैं
संजय, सामाजिक कार्यकर्ता

उत्तरी गुजरात में काम कर रहे संजय का कहना है, "सतह पर सब ठीक लगता है लेकिन बच्चों के भीतर का भय अभी हम ख़त्म नहीं कर पाएँ हैं."

संजय कहते हैं, "अगर हम उन्हें पैंटिंग बनाने को कहते हैं तो एक साधारण और दंगों के माहौल में बढ़े हुए बच्चों की पेंटिंग में फ़र्क साफ नज़र आता है."

उनका मानना है कि अगर इन बच्चों के साथ रिहायशी स्कूलों में काम किया जाए तो नतीज़े बेहतर होंगे.

वो बताते हैं कि कच्छ भूकंप के शिकार कुछ बच्चों को रात में जंगल में ले जाकर और ट्रैकिंग करवा कर भय मुक्त किया गया था पर दंगों के शिकार बच्चों के साथ ऐसा प्रयास करके की कोई व्यवस्था नहीं है.

संजय यह भी कहते हैं कि एक सबसे बड़ी समस्या है लड़कियों के शिक्षण की क्योंकि मुस्लिम समाज के बहुत से लोग लड़कियों को अभी भी शिक्षा से दूर रखते हैं.

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन बच्चों को समाज की मुख्यधारा में लाना एक चुनौती है जिसका पूरे समाज को मिलकर सामना करना है.

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