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बेस्ट बेकरी कांड से उठते सवाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गुजरात की सड़क पर खड़े होकर आप अगर अपने चारों और नज़र दौड़ाएं तो ऐसा लगेगा मानो पिछले साल के सांप्रदायिक दंगों के बाद अब सबकुछ सामान्य हो गया है. मगर सच्चाई ये नहीं है.बीस साल की ज़ाहिरा शेख़ और उसके जैसे कुछ दूसरे लोगों के लिए गुजरात वह जगह नहीं है जहाँ वो बिना किसी डर के रह सकें. ज़ाहिरा और उसके जैसे कुछ अन्य लोग अदालत के सामने भी सच बोल पाने का हौसला नहीं जुटा पा रहे हैं. ज़ाहिरा शेख़ बेस्ट बेकरी मुक़दमे की प्रमुख गवाह हैं. वडोदरा के निकट 12 लोगों को जलाकर मारने के इस मामले में सभी 21 अभियुक्तों को 21 जून 2002 को बरी कर दिया गया था. कारण – 71 में से 45 गवाहों ने अदालत में अपने बयान बदल डाले. अदालत में इन सभी 45 गवाहों ने एक-सी वो कहानी सुनाई जो पुलिस के सामने दिए गए उनके बयान से बिल्कुल अलग थी. बयान क्यों बदले उनके बयानों के बाद अदालत का फ़ैसला क्या होगा इसका अंदाज़ तो सबको था मगर ये जानने की कोशिश किसी ने नहीं की कि गवाह एक-एक कर बयान क्यों बदल रहे थे. मगर अब सामाजिक संगठनों की कोशिश से सनसनीखेज बातें सामने आईं रही हैं. ज़ाहिरा शेख़ ने बताया कि भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक मधु श्रीवास्तव ने इन लोगों को धमकी दी थी जिसके कारण ही सबने अदालत में बयान बदल डाले. मगर मधु श्रीवास्तव इस आरोप से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "मैंने अपने 50 साल के जीवन में किसी को कोई धमकी नहीं दी है.मैं तो इस महिला को जानता भी नहीं." उधर ज़ाहिरा अब बयान बदलने के लिए अफ़सोस कर रही है. वह कहती है, "मैंने बहुत ग़लत किया. आज उन्होंने जो हमारे साथ किया वो कल और किसी के साथ भी कर सकते हैं क्योंकि अब वे डरेंगे नहीं." मानवाधिकार आयोग भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बेस्ट बेकरी मामले पर अदालत के निर्णय पर गहरा असंतोष जताया है.उल्लेखनीय है कि आयोग ने पिछले साल ये सुझाव दिया था कि बेस्ट बेकरी समेत पाँच मामलों की जाँच केंद्रीय एजेंसी से करवाई जानी चाहिए. फ़ैसले के बाद भी आयोग का एक दल इस मामले से संबंधित पुलिस और अदालती रिकॉर्ड लेने अहमदाबाद और वडोदरा आया था. मगर आयोग के इस रूख़ पर कुछ तबके आपत्ति जता रहे हैं और उनको लगता है कि आयोग अदालत की स्वायत्तता में दखल दे रहा है. अहमदाबाद उच्च न्यायालय के वकीलों के एक संगठन ने पिछले दिनों एक प्रस्ताव पारित कर मानवाधिकार आयोग और मीडिया की आलोचना की है और कहा है कि अगर ये हस्तक्षेप बंद नहीं करते तो उनके ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना का मुक़दमा चलाया जाएगा. इस संगठन के अध्यक्ष यतीन ओझा कहते हैं, "आयोग ने इस मामले के रिकॉर्डों की जाँच से पहले ही इस फ़ैसले को ग़लत घोषित कर दिया." भविष्य मानवाधिकार कार्यकर्ता मानते हैं कि ऐसी स्थिति में बेस्ट बेकरी मामले का दोबारा खुलना अनिवार्य है. मूवमेंट ऑफ़ सेकुलर डेमोक्रेसी नामक संगठन के कार्यकर्ता डी एन रथ का कहना है कि अगर बेस्ट बेकरी का मामला एक परंपरा जैसा बन जाता है तो इससे बाकी मामलों पर भी असर पड़ेगा. वे कहते हैं, “लोगों के मन में अब ऐसी शंका है कि बाकी के जो चार मामले हैं उनमें क्या होगा. कुछ विधि विशेषज्ञों का कहना है कि बेस्ट बेकरी कांड में गुजरात सरकार का उच्च न्यायालय में अपील करना अनिवार्य है क्योंकि इसके बग़ैर पीड़ितों को न्याय मिलने की संभावना नहीं है. गुजरात उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस बी जे दीवान कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट में अपील कर इस मामले को किसी और राज्य के उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करवा लेना चाहिए जहाँ गवाह बता सकते हों कि उन्होंने किन हालात में बयान बदले थे." मगर गुजरात सरकार ने अबतक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वो क्या करनेवाली है. सरकारी तौर पर केवल यही कहा गया है कि गृहमंत्रालय फ़ैसले का विश्लेषण कर रहा है. मगर राज्य की सत्ताधारी पार्टी भाजपा अपील के पक्ष में नहीं है और उनका कहना है कि गवाहों को अदालत में ही बताना चाहिए था कि उन्हें धमकाया गया. भाजपा नेता प्रफुल्ल वोरडिया कहते हैं, "अपील नहीं की जानी चाहिए क्योंकि इससे तो यही लगेगा कि सरकार को अदालत में भरोसा नहीं है.तो लोकतंत्र के लिए तो ये अच्छा नहीं होगा". सवाल वैसे एक विवादास्पद सवाल ये भी उठता है कि न्याय ना मिल पाने की स्थिति के लिए ज़िम्मेदार कौन है. जैसे ज़ाहिरा बताती है कि उसके अपने ही समुदाय के लोगों ने उसका साथ नहीं दिया. जाहिरा का कहना है, "कोई मेरा साथ देने को तैयार नहीं था. किसी ने मेरे बारे में नहीं सोचा". मामले में सरकारी वकील की भूमिका पर भी उंगलियाँ उठ रही हैं. वडोदरा बार काउंसिल के अध्यक्ष नरेंद्र तिवारी मानते हैं,"उनकी ज़िम्मेदारी थी कि पुलिस का बयान गवाह को सुनाकर सवाल पूछें मगर सरकारी वकील ने ऐसा नहीं किया". यहाँ सवाल ये उठता है कि फिर जो लोग मारे गए उसका दोषी कौन है. और ऐसे में अदालत की भूमिका के बारे में बातें उठती हैं. जस्टिस दीवान मानते हैं, "न्यायपालिका असफल नहीं है समाज असफल हो रहा है. अभियुक्तों को सज़ा ना दिलवा पाने के लिए सामाजिक दबाव ज़िम्मेदार है." अन्य मामले बेस्ट बेकरी मामले से गुजरात की स्थिति को लेकर कई और सवाल उठते हैं. एक सवाल तो ये है कि इस मामले का मुक़दमा वडोदरा जैसे बड़े शहर में चला जहाँ मीडिया की मौजूदगी थी और इसलिए मामला प्रकाश में आ गया.मगर दूसरे मामलों के साथ क्या हो रहा है. इससे पहले केडियाड मामले में 70 से भी ज़्यादा लोगों को मारने के अभियुक्त निर्दोष साबित हुए थे. ये मामला सुर्खियों में नहीं आ पाया क्योंकि ये जगह पंचमहल ज़िले में था और तब गुजरात में चुनाव भी थे जिसकी शोरगुल में मामला दब गया. मगर अब विभिन्न तबकों से आवाज़ उठ रही है कि बाक़ी मामलों को भी बेस्ट बेकरी की राह पर जाने से रोका जाए इसके लिए क़दम उठाए जाएँ. फ़िलहाल लोगों का ध्यान इस बात पर लगा है कि गुजरात सरकार का अगला क़दम क्या होता है. गोधरा घटना और दंगे
धरा में ट्रेन में आग लगाकर 58 लोगों को ज़िंदा जलाने के मामले में बनाए गए अभियुक्तों पर आतंकवाद निरोधक क़ानून यानी पोटा के तहत मुक़दमा चलाया जा रहा है. मगर गोधरा कांड के बाद हुए दंगों में शामिल अभियुक्तों पर पोटा नहीं लगाया गया है. इसी तरह दंगों के अधिकतर अभियुक्तों को ज़मानत मिल गई है मगर गोधरा कांड के 131 अभियुक्तों में से केवल 13 को ही ज़मानत मिल सकी है. |
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