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शनिवार, 28 फ़रवरी, 2004 को 04:45 GMT तक के समाचार
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गुजरात : कौन जाने कब क्या हो जाए?

तराना अपार्टमेंट
तराना अपार्टमेंट में अब सिर्फ़ तबाही के निशान हैं
फ़ज़ल गाँधी का दिल आज बहुत कड़वा हो चुका है.

फ़ज़ल गाँधी एक सपना देखा करते थे कि उनके बच्चे पढ़लिखकर तरक़्क़ी करें और समाज में घुलमिकर सुख और समृद्धि के साथ-साथ शांति से जिएँ.

लेकिन उनका यह सपना अब तार-तार हो चुका है.

फ़ज़ल गाँधी के घर को 2002 में हुए दंगों में राख कर दिया गया था.

फ़ज़ल गाँधी इस उम्मीद के साथ मुस्लिम बहुल बस्ती से हिंदू बहुल बस्ती में गए थे कि अगर उनके बच्चे मिश्रित समाज में रहेंगे तो उनकी बौद्धिक प्रगति अच्छी होगी.

लेकिन उनका यह अंदाज़ा बहुत ग़लत निकला. उन्हें एक बार फिर मुस्लिम इलाक़े में रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है.

"1985 में मैंने पंचकुआँ इलाक़े में अपना पुश्तैनी घर छोड़ने फ़ैसला किया था और पाल्दी इलाक़े में तराना अपार्टमेंट में रहने लगा था."

फ़ज़ल गाँधी बताते हैं कि उस इलाक़े में तराना अपार्टमेंट ही एक ऐसी बस्ती थी जिसमें छह मुस्लिम परिवार रहते थे.

डर सरकार से ही
 डर तो सरकार से ही है. अगर सरकार जुहापुरा को साफ़ करने का फ़ैसला कर ले तो वह एक घंटे में इसका सफ़ाया कर सकती है.
फ़ज़ल गाँधी

"इसे हमारी बदक़िस्मती ही कहा जाएगा कि जलती आग में से हम किसी तरह ज़िंदा बच गए, हमारे घर तो जला ही डाले गए."

फ़ज़ल गाँधी कहते हैं कि अब वे जुहापुरा इलाक़े में रहते हैं जिसे छोटा पाकिस्तान भी कहकर पुकारा जाता है.

"मैं पाल्दी इलाक़े में इसलिए गया था कि मेरे बच्चों को अच्छी तालीम और सामाजिक परवरिश मिलेगी जिससे अच्छी ज़िंदगी और सोच का रास्ता खुलेगा."

ख़ुशहाली से तबाही

फ़ज़ल गाँधी बताते हैं कि उनके बच्चे काफ़ी प्रतिभाशाली हैं. उनका बड़ा बेटा कंप्यूटर विशेषज्ञ है और एक स्केटिंग का राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी है.

तराना अपार्टमेंट आज वीरान पड़ा हुआ है. अब वहाँ सिर्फ़ पहरेदार के सिवा कोई नहीं रहता. बस कुछ जले हुए स्कूटरों के निशान बाक़ी हैं.

और हैं बच्चों के खिलौनों के जले हुए निशान, फटी पतंगें, जला फर्नीचर और वीरानी की कहानी कहता किचन.

दंगों का नाम आते ही फ़ज़ल गाँधी के आँसू रोके से नहीं रुकते. तबाही की दास्तान अपने आप ही होटों पर आ जाती है.

विश्व हिंदू परिषद का एक बोर्ड
"हिंदू राष्ट्र" के एक इलाक़े में स्वागत

"मैंने कुछ दिन पहले ही अपने छोटे बेटे के लिए साइकिल ख़रीदी थी. उसकी पैकिंग भी नहीं खोल थी कि सबकुछ तबाह हो गया....."

बस उसके बाद फ़ज़ल गाँधी की अपने रेस्तराँ में दिलचस्पी ख़त्म हो गई और उन्होंने वहाँ एक ट्रेवल एजेंसी खोल दी जिसे कोई और ही चलाता है.

"अब मुझे कुछ भी करना अच्छा नहीं लगता. मैं अपने बच्चों के साथ इस देश से बाहर चला जाना चाहता हूँ. वे मेरी सारी जायदाद छीन रख लें, सबकुछ ले लें, लेकिन मैं अब यहाँ नहीं रहना चाहता."

फ़ज़ल गाँधी बताते हैं कि बिल्डरों ने अपनी एक मंडली बना ली है और तराना अपार्टमेंट की बाज़ार के हिसाब से क़ीमत नहीं देना चाहते.

"तराना अपार्टमेंट में इस समय एक मकान की क़ीमत क़रीब 12 लाख रुपए है लेकिन वे पाँच लाख रुपए भी नहीं देना चाहते."

कौन बचाएगा?
 कौन जानता है मेरे दफ़्तर जाते समय क्या हो जाए. अगर कुछ होता है तो कौन बचाएगा?
फ़ज़ल गाँधी

यह पूछे जाने पर कि वे मुस्लिम बहुल इलाक़े में रहते हुए भी असुरक्षित क्यों महसूस करते हैं, फ़ज़ल गाँधी फूटकर रोते हुए कहते हैं, "डर तो सरकार से ही है. अगर सरकार जुहापुरा को साफ़ करने का फ़ैसला कर ले तो वह एक घंटे में इसका सफ़ाया कर सकती है."

"कौन जानता है मेरे दफ़्तर जाते समय क्या हो जाए. अगर कुछ होता है तो कौन बचाएगा?"

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