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गुरुवार, 12 फ़रवरी, 2004 को 09:24 GMT तक के समाचार
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बिलकीस मामले में सीबीआई ने रिपोर्ट सौंपी
दंगे के बाद का एक दृश्य
गुजरात दंगों में कई हज़ार मुसलमान मारे गए थे
गुजरात में मार्च 2002 में शुरू हुए दंगों के दौरान बिलकीस बानो के साथ बलात्कार और उसके 14 रिश्तेदारों की हत्या के मामले में केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दी है.

सीबीआई ने अपनी सीलबंद रिपोर्ट न्यायालय को बिलकीस बानो मामले में सुनवाई के एक दिन पहले सौंपी है.

बिलकीस बानो का आरोप है कि गुजरात के दाहौद ज़िले के लिमखेड़ा इलाक़े में दंगों के दौरान उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उनके 14 रिश्तेदारों की हत्या कर दी गई.

बिलकीस का यह भी आरोप है कि स्थानीय पुलिस इस मामले की जाँच करने के बजाय इसे रफ़ादफ़ा करने की कोशिश करती रही है जबकि उन्होंने गाँव के कई लोगों का साफ़तौर पर नाम लिया था.

गुजरात पुलिस ने इस मामले में किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाई थी और मामला बंद कर दिया गया था.

सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई को यह मामला जनवरी में सौंपा था.

जाँच के दौरान सीबीआई ने चार नरकंकाल बराम दिए हैं जिनमें एक बच्चे का भी है. इन्हें डीएनए परीक्षण के लिए भेजा गयाह .

इस मामले में 13 लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है जिनमें एक पुलिसकर्मी भी शामिल है.

इस पुलिसकर्मी पर सबूतों को मिटाने की कोशिश करने का आरोप है.

बुधवार को ही अहमदाबाद की एक विशेष अदालत ने तीन पुलिसकर्मियों की अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी रद्द कर दी थी.

इन्होंने आशंका जताई थी सीबीआई बिलकीस बानो बलात्कार मामले में उन्हें भी गिरफ़्तार कर सकती है.

घटना

यह मामला सुर्ख़ियों में तब आया जब बिलकीस बानो न्याय माँगने मानवाधिकार आयोग के पास गई और आयोग ने उनका साथ देने का भरोसा दिलाया.

बिलकीस बानो का कहना है कि 3 मार्च 2002 को दंगों में जान बचाकर भाग रहे कुछ लोगों में वह भी शामिल थी.

तभी इन लोगों पर भी दंगाइयों ने हमला कर दिया.

बताया जाता है कि छप्पड़वाड़ गाँव के पास हुए हमले में तीन महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और 14 लोगों मार डाला गया.

इस घटना के वक़्त बिलकीस बानो गर्भवती थीं और उनके साथ भी बलात्कार किया गया.

बिलकीस को दंगाइयों ने मृत समझ लिया था जिसके कारण उनकी जान बच गई.

बिलकीस का कहना है कि उन्होंने पुलिस को दोषियों के नाम भी बताए थे मगर उनकी बात नहीं सुनी गई.

इसके बाद वे अपनी फ़रियाद लेकर मानवाधिकार आयोग के पास गईं जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप किया था और मामला जाँच के लिए सीबीआई को सौंपा गया था.

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