BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
सोमवार, 14 जून, 2004 को 02:49 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मज़दूरी कर रहे हैं बहादुरी का पुरस्कार पाने वाले बच्चे

चुनेश्वरी अपने पिता के साथ
चुनेश्वरी को माँ-बाप के काम पर जाने के बाद घर संभालना पड़ता है
32 फुट गहरे कुएँ में डूब रही पड़ोस की चार साल की बच्ची को बचाने के लिए दुर्ग ज़िले के नेमचंद निर्मलकर को जब गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार मिला तो उसे उम्मीद थी कि अब कम से कम उसके फ़ौज में जाने का सपना साकार हो जाएगा.

लेकिन पुरस्कार के साथ स्नातक तक मुफ़्त शिक्षा, छात्रवृत्ति और हर माह प्रोत्साहन राशि जैसे सारे आश्वासन एक-एक करके झूठे साबित हुए.

एक साल पहले नेमचंद केवल इसलिए परीक्षा में फ़ेल हो गया क्योंकि दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले उनके माँ बाप के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे उसके लिए किताबें ख़रीद सकें.

आख़िर पढ़ाई पूरी करने के लिए उसे अपने माँ-बाप के साथ मज़दूरी करनी पड़ी.

ग्यारहवीं की परीक्षा तो उसने प्रथम श्रेणी में पास कर ली है लेकिन आगे की पढ़ाई कैसे होगी इस चिंता ने उसकी नींद उड़ा दी है.

तीन वर्ष पहले मिले पदक को दिखाते हुए नेमचंद कहते हैं, "पदक और प्रमाणपत्र मेरे लिए बेकार साबित हुए हैं."

सुध नहीं

इसी तरह राष्ट्रीय भरत पुरस्कार पाने वाले 13 साल के त्रिलोचन ने अपने भाई को तेंदुए से बचाया था और तेंदुए को कमरे में क़ैद कर लिया था.

नेमचंद
नेमचंद को लगता है कि पुरस्कार और पदक उसके कोई काम नहीं आया
लेकिन वह ख़ुद पीलिया से नहीं लड़ पाया. इलाज के अभाव में मज़दूर माँ-बाप के बेटे त्रिलोचन की मौत हो गई.

छत्तीसगढ़ राज्य में अब तक 23 बच्चों को पुरस्कार मिल चुका है.

ये बच्चे पुरस्कार मिलने के बाद किस हाल में हैं इसकी सुध लेने की फ़ुर्सत न तो केंद्र सरकार को है न ही राज्य की सरकार को.

राजनांदगांव ज़िले के आमगाँव में रहने वाले पीलूराम साहू और उनकी पत्नी कुँवरिया को तो अब सरकार से कोई उम्मीद नहीं है.

उनके सात साल के बेटे टुमन लाल साहू ने जलते हुए घर में घुसकर छोटी बहन को बचाने का प्रयास किया था.

1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उसे संजय चोपड़ा पुरस्कार दिया और साथ में मिले तीन हज़ार रुपए.

उसके बाद से किसी ने टुमन की सुध नहीं ली.

नौंवी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद मज़दूर माँ-बाप ने हाथ खड़े कर दिए और आज टुमन रोज़ी रोटी के लिए दर-दर भटक रहा है.

अपने बेटे को याद करते हुए टुमन की माँ कुँवरिया की आखों में आँसू भर आते हैं. वो कहती हैं, "पढ़ाई छूटने के बाद से ही टुमन मज़दूरी करने लगा. बाद में काम की तलाश में वह गुजरात चला गया. अब कभी-कभी गाँव आता है."

टुमन इन दिनों सूरत में मज़दूरी कर रहा है.

अपवाद

वैसे कुछ अपवाद भी हैं.

वीरता का पुरस्कार पाने वाली ललिता गाड़ा और विद्या कुमारी यादव अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए हैं क्योंकि उन्हें स्कूल और दूसरे लोगों से मदद मिल गई.

 बहादुर बच्चों के लिए राज्य स्तर पर शीघ्र ही एक पुरस्कार स्थापित किया जा रहा है. इसमें ऐसी व्यवस्था की जाएगी कि पुरस्कार के बाद भी शासन उन बच्चों का ध्यान रखे. राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले बच्चों की दुर्दशा पर हम भी चिंतित हैं
रेणुका सिंह, महिला एवं बाल विकास मंत्री, छत्तीसगढ़
आरंग के गोविंद चंद्राकर इंजीनियर बन गए तो रायगढ़ की हनी राठौर डॉक्टर बन गईं.

लेकिन सबकी क़िस्मत ऐसी नहीं है.

रेवाराम को बमुश्किल नगरी-सिहावा के नगर निगम में जमादार की नौकरी मिल पाई.

दैहान में रहने वाले लीलचंद हलबा को तो संजय चोपड़ा राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ तीन हज़ार रुपए भी नहीं मिले. वह भी दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद मज़दूरी करने सूरत चला गया.

पिछले साल वीरता पुरस्कार पाने वाली सात साल की चुनेश्वरी कोठलिया से जब मैं मिलने पहुँचा तो वह बर्तन माँजने में मशगूल थी.

उसने अभी पहली कक्षा पास की है और आगे पढ़ना चाहती है लेकिन मज़दूर माँ-बाप के लिए यह मुश्किल ही दिखता है.

माँ-बाप दोनों ही मज़दूरी करने जाते हैं तो घर का काम चुनेश्वरी को ही संभालना पड़ता है.

राजधानी दिल्ली की एक संस्था ने आश्वासन दिया था कि वह चुनेश्वरी की आजीवन पढ़ाई लिखाई का खर्च उठाएगी लेकिन उस संस्था की ओर से कोई आया ही नहीं.

छत्तीसगढ़ की महिला एवं बाल विकास मंत्री रेणुका सिंह कहती हैं, "बहादुर बच्चों के लिए राज्य स्तर पर शीघ्र ही एक पुरस्कार स्थापित किया जा रहा है. इसमें ऐसी व्यवस्था की जाएगी कि पुरस्कार के बाद भी शासन उन बच्चों का ध्यान रखे. राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाले बच्चों की दुर्दशा पर हम भी चिंतित हैं."

साफ़ है कि राज्य सरकार के एजेंडे में फ़िलहाल राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वालों के लिए कोई योजना नहीं है.

(हमारे बहुत से पाठकों ने इन बच्चों की सहायता करने की इच्छा ज़ाहिर की है. हम उन स्वंयसेवी संस्थाओं का पता लगा रहे हैं जिनसे आप संपर्क कर सकते हैं. जल्दी ही पता आप इसी पन्ने पर देख सकेंगे.-संपादक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम)

इससे जुड़ी ख़बरें
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>