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बच्चों में बढ़ रही है आपराधिक प्रवृत्ति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
नाबालिग़ बच्चों का ग़ुस्से में आकर किसी का क़त्ल कर देना, पैसों के लिए किसी को अगवा कर लेना, प्रेमिका को रिझाने के लिए चोरी करना या ख़ून तक कर देना. अब ये सब न तो सिर्फ़ रुपहले पर्दे की कहानियाँ हैं और न ही किसी सुदूर पश्चिमी देश की आम घटनाएँ. ये अब भारतीय समाज का भी एक कड़वा सच बनता जा रहा है. पिछले एक महीने में मुंबई में चार ऐसी हत्याएँ हुई हैं जिनमें पुलिस ने नाबालिग़ बच्चों को पकड़ा है. पवई के सेंट ज़ेवियर हाईस्कूल की नवीं कक्षा में पढ़ने वाला 14 वर्षीय कौशल जोशी एक शांत सा दिखने वाला आम लड़का था. वह 14 मई की शाम दोस्तों का फोन आने के बाद उनसे मिलने जो गया तो फिर लौटा ही नहीं. अगले दिन उसकी लाश मिली. हत्यारों ने रस्सी से गला घोंटने के बाद पत्थरों से उसका सिर कुचल दिया था. इस मामले की जाँच कर रहे पुलिस अधिकारी विलास शिर्के कहते हैं, "मैं 32 साल से मुंबई पुलिस में हूँ मगर इस तरह का घटिया और चौंकाने वाला काम मैंने पहली बार देखा है.स्कूल जाने वाले छोटे बच्चों ने अपने ही दोस्त का ख़ून कर दिया और वो भी पैसों के लिए. इसका कारण है हमारा रहन-सहन जिसमें अब किसी के लिए कोई भावना ही नहीं है." इस मामले में पुलिस ने चार लड़कों को गिरफ़्तार किया है जिनमें से एक कौशल का सहपाठी और क़रीबी दोस्त है. पुलिस का कहना है कि दोस्तों ने कौशल को पैसे के लिए अगवा किया मगर जब उन्हें पता चला कि कौशल के माँ-बाप शहर से बाहर हैं तो उन्होंने उसकी हत्या कर दी. बच्चों में बढ़ा ग़ुस्सा स्कूल के प्राध्यापक जॉर्ज अथाइडे कहते हैं, "बच्चों में ग़ुस्सा बहुत बढ़ा है. मुझे लगता है कि बच्चों के लिए किसी के पास समय नहीं है. उनको किसी से अपने मन की बात कहने का मौक़ा ही नहीं मिलता."
प्राध्यापक के अनुसार बच्चे को घर में जहाँ माँ-बाप के ग़ुस्से का सामना करना पड़ता है वहीं स्कूल में उसे शिक्षकों की डाँट का डर रहता है. अब ऐसे में बच्चा अपना ग़ुस्सा किस पर निकालेगा. जॉर्ज अथाइडे कहते हैं कि बच्चा इसलिए हमउम्र बच्चों से झगड़ा करता है. इसके साथ ही बच्चों पर परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने के लिए भी काफ़ी दबाव रहता है. पुलिस के अनुसार इसी दबाव से तंग आकर विजय शर्मा ने अपनी माँ की ही हत्या कर दी. पुलिस कहती है कि विजय ने इस बात को स्वीकार किया है कि वह अपने पूरे परिवार की हत्या करके सारी जायदाद का अकेला मालिक बनना चाहता था. यह सब कुछ बिल्कुल हिंदी फ़िल्मों जैसा है. पुलिस का कहना है कि विजय भी फ़िल्मों से काफ़ी प्रभावित था और ख़ून करने के बाद उसने चुराए हुए पैसों से फ़िल्में भी देखीं. तोड़-फोड़ की प्रवृत्ति मनोवैज्ञानिक डॉक्टर अंजलि छाबड़िया कहती हैं कि पिछले पाँच-दस वर्षों से हम देख रहे हैं कि बच्चों में हिंसा काफ़ी बढ़ी है. उनके अनुसार पहले बच्चों की शिकायत होती थी कि माँ-बाप मारते हैं मगर अब तो माँ-बाप की शिकायत हो गई है कि जब बच्चों को मनपसंद चीज़ें नहीं मिलती है तो वे तोड़-फोड़ करते हैं. डॉक्टर छाबड़िया के अनुसार इस पर ग़ौर करना ज़रूरी हो गया है. इसके कई कारण भी हैं और बच्चे टीवी से काफ़ी प्रभावित हो रहे हैं. उनके अनुसार सब जल्दी ही अमीर बनना चाहते हैं और शिक्षा प्रणाली औसत से बेहतर बच्चों के लिए है. बच्चों के सामने अब कोई आदर्श नहीं रह गया है. मुंबई के पुलिस आयुक्त एएन रॉय कहते हैं कि एक साथ इतने सारे बच्चों के जुर्म के मामलों का सामने आना महज एक इत्तेफ़ाक है. रॉय मानते हैं कि एक तो समाज में नैतिक पतन हुआ है और दूसरा बच्चे फ़िल्मों से काफ़ी प्रभावित हो रहे हैं. काउंसेलर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष डॉक्टर हरीश शेट्टी कहते हैं कि बच्चों की मदद के लिए वह जल्दी ही एक चौबीसों घंटे चलने वाली हेल्पलाइन शुरू कर रहे हैं. इससे बच्चे अपनी कठिनाइयों के बारे में फ़ोन पर किसी से बात कर सकेंगे. |
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