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आज़ादी के बाद हिंदुस्तानी सिनेमा में खलनायक का रुप लगातार बदलता रहा है. डाकू, तस्कर से नेता तक. लेकिन खलनायक ही नायक बन जाए तो? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुपरिचित फ़िल्मकार श्याम बेनेगल का मानना है कि आज़ादी के बाद से भारतीय सिनेमा में विषय से लेकर तकनीक तक बहुत कुछ बदल गया है. | जावेद अख़्तर के साथ कई यादगार फ़िल्म लिखने वाले सलीम ख़ान मानते हैं कि आज के फ़िल्मकारों में असुरक्षा की भावना अधिक है और जुनून की कमी है. | सुपरिचित संगीतकार ख़य्याम का कहना है कि पहले किसी फ़िल्म में कहानी, गीत और संगीत सब एक जैसा होता था और संगीत का प्रचार नहीं करना पड़ता था. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||