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हीरो: कड़ी चुनौती से अभिनयहीनता तक | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज़ादी के बाद के इन 60 वर्षों में हिंदी फ़िल्मों के नायकों में क्या ‘विकास’ हुआ है और कैसा बदलाव आया है इस पर ग़ौर करने से पहले शायद यह देखना ज़रूरी है कि द्वितीय विश्व युद्ध की शुरूआत (1939-40) से 1947 तक बम्बइया सिनेमा के हीरो कौन और कैसे थे. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारी फ़िल्मों पर विश्व के तत्कालीन आधुनिकीकरण, हमारे स्वतंत्रता-संग्राम और दूसरी बड़ी लड़ाई यानी द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-45) ने गहरा असर डाला था और उनके सभी पहलुओं को निर्णायक रूप से बदला था. 1940 का वह दशक हिंदी सिनेमा का एक संक्रमण-युग था- एक ओर केएल सहगल, पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी, चंद्रमोहन, कुमार, सुरेंद्र, शाहू मोडक, जयराज, प्रेम अदीब, जॉन कावस, किशोर साहू, मोतीलाल, अशोक कुमार, सरीखे छोटी-बड़ी प्रतिभाओं वाले नायकों का बॉक्स-ऑफ़िस पर सम्मिलित प्रभुत्व था तो दूसरी ओर दिलीप कुमार (ज्वार-भाटा,1944), देव आनंद (हम एक हैं, 1946), किशोर कुमार (शहनाई, 1947), तथा भारत भूषण (सुहागरात,1948) जैसे नवनायक प्रसिद्धि-द्वार पर दस्तक दे रहे थे. आवाज़ के साथ बदला परिदृश्य पहले बोलपट ‘आलम आरा’ (1931) के पहले ही हिंदी सिनेमा की अधिकांश मूल रुढ़ियाँ और परिपाटियाँ निश्चित हो चुकी थीं लेकिन जब पर्दे पर आवाज़ें सुनाई देने लगीं तो अभिनेताओं के चेहरों, शरीर-भाषा के साथ अभिनय में गले और स्वर का केंद्रीय महत्त्व पहचाना गया.
स्थिति विशेष में कोई अभिनेता अपने संवाद कैसे बोलता है इस पर उसकी कला का दारोमदार आ गया. पारसी, लोक रंगमंच, तथा बांग्ला अभिनय की अतिनाटकीय शैलियाँ बदलते युग और समाज में हास्यास्पद लगने लगीं, बरुआ ने बांग्ला ‘देवदास’ में नायक की परिभाषा को बदला, जिसमें रवींद्रनाथ ठाकुर तथा शरतचंद्र चट्टोपाध्याय सरीखे लेखकों का भी दूरगामी योगदान रहा. अचानक सहगल, सोहराब मोदी, पृथ्वीराज, चंद्रमोहन, जयराज, कुमार, शेख़ मुख़्तार सिर्फ़ उम्र के कारण ही नहीं, अभिनय-कला में बदलाव की वजह से पुराने पड़ने लगे. निस्संदेह इसमें कुछ भूमिका तत्कालीन अंग्रेज़ीभाषी फ़िल्मों की भी रही होगी. यूँ तो अतिनाटकीयता दक्षिण एशियाई मानवता का स्थाई भाव है लेकिन उसमें कमी भी आती रही. उस ‘कटौती’ के शिकार 1950 के पहले के कई नायक हुए. सिर्फ़ जिन्हें तब स्टंट फ़िल्में कहते थे, जो ‘टकाटकी’ की फ़िल्में कहलाती थीं, ‘ढिशुंग-ढिशुंग’ और ‘ढिशच्याँव,ढिशच्याँव’ के ‘साउंड इफ़ैक्ट्स’ का ज़माना 1970 के दशक में आने वाला था. उनके नायक जॉन कावस, भगवान, बाबूराव आदि कुछ बरस और चले. मोतीलाल और अशोक कुमार पुराने और नए अभिनय के बीच की दो महत्त्वपूर्ण कड़ियाँ हैं. हैं तो किशोर साहू भी, लेकिन उनमें कभी इन दोनों जैसा ‘बॉक्स-ऑफ़िस कैरिज़्मा’ नहीं रहा. यह अवश्य है कि उन्होंने कुछ सोद्देश्य फ़िल्में निर्मित-निर्देशित कीं, जो ‘नई शैली’ की थीं, और दिलीप कुमार को ‘नदिया के पार’ (1948) में निर्देशित किया. मोतीलाल और अशोक कुमार के बीच सहज, स्वाभाविक, रोज़मर्रा का अभिनय करने में बाज़ी मोतीलाल ही मार ले जाते हैं लेकिन कलकत्ता में लगातार तीन बरस चलने वाली ‘क़िस्मत’ (1943) में ‘नायक’ तो क्या ‘अनायक’ की युगांतरकारी भूमिका निभाने वाले अशोक कुमार पिछली सदी के अंत तक फ़िल्मों और सीरियलों में आते रहे और आज के युवा नक़्क़ाल उनकी संवाद-शैली से करोड़ों का मनोरंजन करते रहते हैं. मोतीलाल की विरासत तनूजा से होती हुई काजल तक आती है.
दिलीप कुमार, देव आनंद और राजकपूर की नायक कभी हिंदी सिनेमा में पुरुष-अभिनय की केंद्रीय त्रिमूर्ति है. इनमें सर्वाधिक सर्वतोमुखी दिलीप हैं, राजकपूर अभिनय के मामले में उतने नहीं हैं जबकि देव आनंद में अभिनय-क्षमता सबसे कम है. दिलीप कुमार को ‘ख़ुदा-ए-अदाकारी’ कहा जाता है. उन्होंने अभिनय की परामितियाँ बदल डालीं, उसके कठिन सर्वोच्च मानदंड स्थापित किए और करोड़ों दर्शकों को उत्कृष्ट अभिनय क्या होता है यह समझने में प्रशिक्षित किया. ‘अंदाज़’, ‘देवदास’, ‘मधुमती’, ‘कोहिनूर’, ‘नया दौर’, ‘मुग्ल-ए-आज़म’, ‘गंगा-जमना’, ‘राम और श्याम’, ‘संघर्ष’, ‘संगीता महतो’, ‘क्राँति’, ‘शक्ति’, ‘कर्मा’ और ‘सौदागर’ सरीखी फ़िल्मों में अदभूत वैविध्यपूर्ण अभिनय करते हुए उन्होंने पात्रों का कोई ‘प्रकार’ अछूता नहीं छोड़ा. बेशक़ उन्होंने कुछ घटिया फ़िल्मों में भी काम किया लेकिन शोचनीय अभिनय ‘क़िला’ सरीखी अंतिम फ़िल्मों में ही प्रदर्शित किया है. दिलीप कुमार त्रासदी और कॉमेडी दोनों के मालिक रहे. उनका असर राजेंद्र कुमार, राजकुमार, मनोज कुमार, राजेश खन्ना और आज के शाहरुख़ ख़ान तक में देखा जा सकता है. लेकिन उनसे लगभग सब-कुछ सीखकर उनसे आगे सिर्फ़ अमिताभ बच्चन जा सके हैं. दिलीप कुमार को अब कोई भूमिकाएँ नहीं दी जा सकतीं क्योंकि 85 वर्ष की उम्र में अब उनके ‘रिफ़्लैक्स’ ठीक से काम नहीं कर रहे. अमिताभ 65 की आयु में दिलीप से कहीं ज़्यादा व्यस्त हैं, उनके किरदारों में वैविध्य भी आया है.
अभिनय-प्रतिभा राजकपूर में भी कम नहीं थी- त्रासदी के दृश्य वे बहुत अच्छे कर लेते थे लेकिन उन्होंने चार्ली चैप्लिन को अपना आदर्श बनाया और अपने पिता पृथ्वीराज कपूर और अपने लेखक ख़्वाजा अब्बास का उन पर गहरा असर रहा. उन्हें ‘जोकर’ बनने से कभी गुरेज़ नहीं किया. उनके इस ‘अभिनैतिक’ साहस से उनके सलकालीनों और परवर्तियों ने बहुत कुछ सीखा. चैप्लिन के भारतीयकरण में राजकपूर की शायद एकमात्र भूमिका है. आज जो अभिनेता 50 की उम्र के आसपास हैं उनमें अनिल कपूर ने राजकपूर से सबसे ज़्यादा सीखा है. देव आनंद हॉलीवुड के बड़े नायक ग्रेगरी पेक से कब प्रभावित हुए यह कहना कठिन है किंतु पेक की कुछ अदाओं को छोड़कर उन्होंने उनसे उस तरह का अच्छा अभिनय कभी नहीं सीखा जो ‘रोमन हॉलिडे’, ‘टु किल ए मॉकिंग बर्ड’ या ‘दि गांस ऑफ़ नावारोने’ में दिखाई देता है. देव आनंद एक मज़ेदार, मनोरंजक प्लेब्वॉय बनकर ही रह गए लेकिन बाज़ वक़्त वे दिलीप कुमार और राजकपूर से ज़्यादा लोकप्रिय सिद्ध हुए. दरअसल हल्का फुल्का खिलंदड़ा भले दिलवाला रोमैंटिक हीरो लोकप्रिय सिनेमा की जान हैं और कई दशकों तक देव आनंद वह रहे. दिलीप, राज और देव तीनों की हेयर-स्टाइल, डायलॉग-डिलीवरी, बोल-चाल-ढाल, कपड़ों आदि की नकल करोड़ों दर्शकों ने की लेकिन देव आनंद शायद उसमें अव्वल रहे. उनकी शैली इतनी पेटेंट थी कि उनके किसी सलकालीन ने उसकी नकल करने की ज़ुर्रत नहीं की, बाद में जैकी श्राफ़ ने उनका असर स्वीकार किया और कभी-कभी शाहरुख में भी वह झलक जाता है.
हिंदी सिनेमा के इतिहास में बलराज साहनी शायद एकमात्र प्रतिबद्ध और सर्वोच्च बुद्धिजीवी हुए हैं.यह नहीं कि वे ‘हैंडसम’ नहीं थे या उन्होंने संभ्रांत किरदार नहीं निबाहे लेकिन वे हिंदी सिनेमा के पहले ‘असली’ किसान-मज़दूर के रूप में पहचाने गए. अभिनेता वे दिलीप कुमार की टक्कर के थे लेकिन उनमें वैविध्य और ‘कैरिज़्मा’ उतना न था. लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि वे ओम शिवपुरी, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, रघुवीर यादव आदि जैसे प्रतिभावान अभिनेताओं के पूर्वज ठहरते हैं, एक तरह से शायद नाना पाटेकर के भी लेकिन नाना में जो एक ‘मैनिक’ तत्व है वह ‘अंदाज़’ के दिलीप कुमार और कुछ-कुछ राजकुमार का है. अभिनय-शैली के विकास में केंद्रीय महत्त्व का एक नाम शम्मी कपूर का है. उन पर प्रारंभिक प्रभाव शायद राजकपूर और एल्विस प्रेस्ली का रहा होगा लेकिन बाद में उन्होने अपनी एक अलग ‘जंगली’ शैली विकसित की जिसका गहरा असर जितेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती आदि से होता हुआ आज के युवतम नायकों में देखा जा सकता है क्योंकि संकोचहीन नाच-गाने आज की लोकप्रिय फ़िल्म की रीढ़ बन चुके हैं. शायद कुछ किशोर कुमार का भी हो क्योंकि उनकी नाचने-गाने और अभिनय की शैली तो शम्मी कपूर से भी ज़्यादा ‘क्रेज़ी’ थी. आज अधिकांश पुरुष-गायक किशोर कुमार की गायन-शैली की ही रोटी खा रहे हैं, यह तो सुविदित है. आज शायद इरफ़ान और केके मेनन को दिलीप, बलराज साहनी, नाना, नसीर, ओमपुरी की परंपरा में रखा जा सकता है और ऋतिक तथा आमिर को अभिनेताओं के रूप में कुछ गंभीरता से लिया जा सकता है वरना सलमान ख़ान, अक्षय कुमार, गोविंदा, सनी देवल, सुनील शेट्टी, अजय देवगन, जॉन अब्राहम, अभिषेक बच्चन आदि के अभिनय में ऐसा कुछ नहीं है जो उल्लेखनीय हो. विवेक ओबेराय और सैफ़ अली ख़ान ने अलबत्ता अपनी जगह बनाई है. संजय दत्त की उपस्थिति निस्संदेह बहुत सशक्त है किंतु अपराध और कॉमेडी के अलावा उनके पास अभिनय के लिए बहुत ज़्यादा नहीं है. आशा-निराशा 1947 से अब तक हिंदी फ़िल्मों के नायकों का इतिहास हमें निराश क्यों करता है? दरअसल कुसूर आज के नायकों का कम है, निर्माता, निर्देशक और खलनायकों का ज़्यादा है. आप चाहें तो बदलते हुए सामाजिक, सांस्कृतिक और सिनेमा मूल्यों को भी इसके लिए दोषी ठहरा सकते हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अब हमारे यहाँ ऐसा सिनेमा बन ही नहीं रहा है जो विशिष्ट अभिनय-प्रतिभा की माँग करे.
जिस भी गुणवत्ता का हो, 1980-90 के पहले का हिंदी सिनेमा पूरे समाज का सिनेमा था. उसमें हर तरह के पात्र आते थे, मुख्यतः पलायनवादी वह भले ही हो, आज विषय हैं ‘अपराध’, ‘शादी-ब्याह’, ‘यौनोत्तेजन’, ‘विदेश-प्रवास’ या ‘विदेश-निवास’. वर्ग और वर्ण के भयावह फ़र्क़ यहाँ मौजूद नहीं हैं. अधिकांश हिंदी सिनेमा आज या तो देशी महानगर का है या अंग्रेज़ी भाषी गोरे विलायती महानगर का. इस सिनेमा में अभिनय की कोई ज़रूरत, कोई स्कोप ही नहीं है. कोई भी रोल किसी को भी सूट करता है या किसी को नहीं करता इसलिए सब चलता है. लोग आज भी सोचते हैं कि ‘मदर इंडिया’ में यदि राजकपूर और दिलीप कुमार काम कर लेते तो कैसी फ़िल्म बनती. यह भी सोचा जाता है कि यदि 1975 में अमिताभ को लेकर ‘देवदास’ बनती तो अभिनय का शायद एक नया परिच्छेद खुलता. क्या जॉन अब्राहम, अभिषेक बच्चन आदि को लेकर कोई ऐसी कल्पना करने की हिमाकत कर सकता है? और वैसी फ़िल्में हैं कहाँ? |
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